थूकने की बढ़ती समस्या पर अंकुश लगाने के लिए 'इज़ीस्पिट' का अनावरण

~ इको-फ्रेंडली स्पिटून के उत्पाद के बारे में जागरूकता फैलाने का इस स्टार्टअप का उद्देश्य ~

~ 24 महिलाओं की टीम इस विशेष इनोवेशन की मैन्युफैक्चरिंग संभाल रही हैं ~


मुंबई :
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जयंती के उपलक्ष में राष्ट्रीय राजधानी में इज़ीस्पिट (EzySpit) का अनावरण किया गया है, जिसका उद्देश्य स्वच्छ भारत की मुहिम को आगे बढ़ाना है। यह इनोवेशन एक क्रन्तिकारी उत्पाद है जो आपको कहीं भी कीटाणु फैलाने के डर के बिना थूकने की आजादी देता है। 7 साल के अध्ययन और परिश्रम से देश के तीन युवाओं द्वारा रितु मल्होत्रा,प्रतीक हरडे और प्रतीक कुमार मल्होत्रा द्वारा इस अनोखे इनोवेशन का निर्माण किया गया है।

शुरुवाती दौर में यह इनोवेशन महाराष्ट्र, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, दिल्ली एनसीआर समेत गुजरात, बिहार, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, तेलंगाना, हरियाणा व पश्चिम बंगाल की मार्किट में उतारा जायेगा। इस स्टार्टअप का उद्देश्य सार्वजनिक जगह थूकने की बढ़ती समस्या पर अंकुश लगाने के लिए भारत मे इको-फ्रेंडली स्पिटून के उत्पाद के बारे में जागरूकता फैलाना है. यह अभियान मानव थूक के कचरे से पौधों को विकसित करने के विचार के साथ बनाया गया है।


इज़ीस्पिट की को-फाउंडर रितु मल्होत्रा और उनकी टीम ने कहा, “हमें यकीन है कि यह सार्वजनिक जगह थूकने के धारणा को तोड़ देगा और इस अभियान का उद्देश्य व्यक्तियों के बीच खुले में थूकने से हतोत्साहित करना और बदले में इन पुन: प्रयोज्य स्पिटून के उपयोग के बारे में जागरूकता फैलाना है। यह पॉकेट पाउच (10 से 15 बार पुन: प्रयोज्य), मोबाइल कंटेनर (20 ,30,40 बार पुन: प्रयोज्य) और स्पिटबिन (2000 से 5000 बार पुन: प्रयोज्य) में उपलब्ध है, इज़ीस्पिट स्पिटून में मैक्रोमोलेक्यूल पल्प तकनीक है और यह एक ऐसी सामग्री से लैस है जो लार में मौजूद बैक्टीरिया और वायरस को लाॅक करती है। हम 2015 से इस प्रोडक्ट को बनाने के लिए अध्यन कर रहे थे और आज हम इसे लेकर देश के सामने आये हैं। हमारा यह प्रयास स्वच्छ भारत और आत्मनिर्भर भारत को सफल बनाने का है। सबसे अनोखी बात इसकी पुरी मैन्युफैक्चरिंग महिलाओं की टीम संभाल रही है 24 महिलाओं की टीम इस विशेष इनोवेशन संभाल रही हैं। हमारा उद्देश्य मनुष्यों और प्रकृति के बीच संबंधों सुधारना है, और पारिस्थितिकी तंत्र में सुंदरता और स्वास्थ्य को बढ़ावा देना है। इन्हीं चीजों पर ही हमारा अस्तित्व और स्वास्थ निर्भर हैं।"

भारतीय रेल हर साल थूकने के कारण बने दाग धब्बे व निशानों को साफ़ करने के लिए 1200 करोड़ रूपए और साथ में ढेर सारा पानी खर्च करती हैं। रेलवे स्टेशन के अलावा बस स्टैंड, हॉस्पिटल, बाज़ारों और कई अन्य सार्वजानिक स्थानों में भी थूक के धब्बे देखने को मिलते हैं । जिस तरह अनेक सार्वजानिक स्थानों में शौचालय, कूड़ा दान आदि की उचित व्यवस्था है उसी प्रकार थूकने की भी कोई उचित व्यवस्था होनी जरुरी है ताकि लोग किसी भी स्थान पर थूक न सकें और संक्रमण न फैले। । इसमें 20 या उससे अधिक बार थूका जा सकता है। थूकने पर यह उसे सोख लेते हैं और बाद में इसे मिटटी में डाल सकते हैं जहाँ पौधा भी उगाया जा सकता है। सफाई के साथ पौधारोपण के इस अनोखे इनोवेशन की तारीफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर रतन टाटा भी कर चुके हैं।

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