"अस्तित्व"

अर्चना त्यागी (जोधपुर राजस्थान)

मैं चलती थी जमीन पर
एक दिन मुझ पर
पड़ी तुम्हारी नजर।
तुमने मुझे उठाकर
पलकों पर बिठा लिया।
अपने दिल का
खास कोना
तुमने मुझे दिया।
परन्तु मुझे क्या हुआ ?
खुश ना रह पाई
उसमे एक पल।
कैद सी लगी मुझे
तुम्हारे प्रेम की सौगात।
लगता था
एक पिंजरा है, तुम्हारा दिल
कैसे समा सकती हूं उसमे ?
मुझे तो चलने की धुन है।
मुझे पंख दिए हैं, सृष्टि ने
उड़ना मेरा नियम है।
एक दिन मैं
उड़ भी गई।
बहुत दूर, विस्तृत आसमान में।
जहां भी थकी मैं
जहां भी रुकी मैं
वो पिंजरा याद आया।
तुम याद आए।
उस पल भली लगी
वो कैद, सच।
मैं लौट चलूं
यह भी चाहा मैंने।
कदम नहीं उठे
फिर से उस और।
मैं निकल अाई थी
तुमसे दूर, बहुत दूर।
संभव न था
वहां से मुड़ना।
तुमने फिर किसी को कैद किया ?
या खाली है वो पिंजरा
मेरी आस में, आज भी।

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