Mirzapur : कण-कण में शंकर पर दिलों में दिख रहा अंतर, शिवरात्रि-पर्व का रूप कुछ बदला-बदला सा दिखा

प्रतीक चित्र

- सलिल पांडेय

मीरजापुर, (उ.प्र.) : प्रकृति तो नहीं बदली लेकिन मानव जरूर बदलता दिखा विषपायी महादेव की आराधना के वर्ष भर के सबसे महत्त्वपूर्ण शिवरात्रि पर्व पर। मौसम सुबह से सुहावना बनकर सुशांत-रूप के महादेव की अभ्यर्थना करने में लगा दिखा लेकिन पूरे दिन से लेकर देर रात तक इस पर्व के सनातनी-परंपराओं पर बदलाव स्पष्ट दिख रहा था।

'बम-बम बोल रहा है काशी और होली खेलें मसाने में' की गूंज नहीं सुनाई पड़ी

प्रायः विगत वर्षों में देवालयों-शिवालयों से लेकर मंदिरों-आश्रमों तक में लाउडस्पीकर के जरिए भक्ति-संगीत की गूंज वातावरण को आस्था और श्रद्धा में तब्दील करने में सहायक होती थी लेकिन इस बार नगर में सन्नाटा ही सन्नाटा रहा।

न अखण्डपाठ, न रुद्राभिषेक : आखिर आस्था कहाँ गई?

शिवरात्रि पर मंदिरों ही नहीं बल्कि तमाम घरों में रामचरितमानस का अखंड पाठ होता रहा। इसी तरह रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों से महादेव के अभिषेक की परंपरा रही लेकिन इक्के-दुक्के स्थानों को छोड़कर कहीं भी कुछ नहीं हुआ। यहां तक कि अति श्रवण-प्रिय शिवतांडव स्त्रोत के श्लोक भी नहीं सुनाई पड़े।

सोशल-साइट पर अवतरित खूब हुए शिवा-शिव- सबसे सरल माध्यम होने के कारण यह माध्यम शिवपूजा के लिए मुफीद देखा गया।

नकली-ठंडई

हर मुहल्ले, गली, गांव-गिरांव में शिवमन्दिर हैं। गांवों में तो सामूहिकता की भावना कुछ हद तक रही लेकिन मुख्यालय पर अधिकांश मंदिरों में ठंडई या तो बनी नहीं या बनी तो मंदिरों के कर्त्ता-धर्ता चोरी-चोरी खुद ही गटक गए। वरना प्रसाद के रूप में पूरे इलाके के लोगों को बुला-बुलाकर मंदिरों से प्रसाद के रूप में ठंडई दी जाती रही। नगर के अनेक स्थानों पर नकली पाउडर की ठंडई 40/- सामान्य कुल्हड़ की बिक रही थी। कुल्हड़ में नीचे पाउडर जम जा रहा था।

हर कोई डरा कोरोना से पर नहीं डर रहा है करनी से

प्रसन्नता के देवता के विवाह के त्योहार पर भी प्रसन्नता कम दिखने का कारण कोरोना के बर्थ-डे का महीना भी हो सकता है लेकिन खानपान में मिलावट जस का तस चल ही रहा है।

मंदिरों में भी असर

अधिकांश मंदिरों का नेचर बदल रहा है। इस तरह के मन्दिर धनाढ्य या रुतबेदार लोगों के कल्याण में अब ज्यादा दिखने लगे हैं। *भारी-भरकम गिफ्ट लेकर ससुराल गए दामाद और खाली हाथ गए दामाद* में जो भेदभाव होता है, कुछ ऐसा ही स्वरूप अनेक मंदिरों का हो गया है। बहरहाल जिनकी श्रद्धा थी, उन्होंने अपने स्तर से कुछ किया भी।

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