जन जागरूकता से दिव्यांगता को कम किया जा सकता है

विश्व दिव्यांग दिवस (3 दिसंबर) पर विशेष

- मनोज कुमार तिवारी 

आधुनिक समय में व्यक्ति प्राकृतिक तरीकों को छोड़कर भौतिक संसाधनों पर अधिक निर्भर होता जा रहा है वातावरण में प्रदूषण बढ़ने, खाद्यान्न में मिलावट एवं कृषि के क्षेत्र में अत्यधिक कीटनाशक, खाद एवं रसायनओं का प्रयोग करने से दिव्यांग बच्चों के जन्म दर में वृद्धि कर रहा है। भारतीय सांख्यिकी मंत्रालय के एक अनुमान (2018) के अनुसार भारत में 2.2 करोड़ दिव्यांगजन हैं, जिनमें से 70% लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज (2019) के अनुसार भारत में 19 वर्ष से कम उम्र के 78 लाख बच्चे रहते हैं। 

विश्व दिव्यांग दिवस हर वर्ष 3 दिसंबर को मनाया जाता है 1981 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय वर्ष दिव्यांग जनों हेतु घोषित किया गया था तथा 1983-1992 को "दिव्यांगजनों के संयुक्त राष्ट्र दशक" घोषित किया गया था। भारत में भी समय-समय पर दिव्यांगजनों के कल्याणार्थ नियम- कानून एवं योजनाएं बनाई जाती रही हैं। इन सभी का उद्देश्य लोगों को दिव्यांगता के प्रति जागरूक करना है।

दिव्यांगता के प्रकार : दिव्यांगता अधिकार अधिनियम 2016 में 21 प्रकार के दिव्यांगता का वर्णन है। जिनमें मानसिक मंदता, ऑटिज्म, सेरेब्रलल, पॉल्सी, मानसिक रोगी, श्रवण बाधित, मूक निशक्तता, दृष्टिबाधिता, अल्प दृष्टि, चलन निशक्तता, कुष्ठरोग, बौनापन, तेजाब हमला पीड़ित, मांसपेशी विकार, स्पेसिफिक लर्निंग डिसेबिलिटी, बौद्धिक नि:शक्तता, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, पार्किंसस रोग, हिमोफीलिया, थैलेसीमिया, सिकल सेल डिजीज व बहू निशक्तता है।

दिव्यांगता के कारण : 

जन्म से पूर्व के कारण : गर्भवती महिला का उम्र 17 वर्ष से कम या 34 वर्ष से अधिक होना, गर्भवती महिला को पोषण न मिलना, गर्भवती महिला को आराम की कमी, गर्भवती महिला का टीकाकरण न होना, दो गर्भ में पर्याप्त अंतराल का न होना, गर्भ में दो या दो से अधिक बच्चे होना, बिना डॉक्टर के सलाह के दवाओं का प्रयोग करना, गर्भपात का असफल प्रयास करना, आत्महत्या का असफल प्रयास करना, गर्भावस्था में दुर्घटना, गर्भावस्था में गंभीर बीमारी, गर्भावस्था में गंभीर संक्रमण, गर्भावस्था में तनाव तथा गर्भावस्था में नशा करना आदि।

जन्म के बाद के कारण : बच्चे को संक्रमण या जोखिमपूर्ण वातावरण में जन्म देना, अप्रशिक्षित व्यक्ति से प्रसव कराना, प्रसव में अत्यधिक समस्या होना, अत्यधिक प्रसव पीड़ा या प्रसव पीड़ा न होना, बहुत कम या बहुत अधिक वजन का बच्चा होना, जन्म के समय बच्चे का न रोना, पैदा होते समय बच्चे का रंग पीला या नीला होना, कुपोषण, बच्चे को गंभीर बीमारी होना, बच्चे को गंभीर संक्रमण होना, दुर्घटना, उच्च तनाव, दवाओं का दुष्प्रभाव, आत्महत्या का असफल प्रयास, नशा करना, उपरोक्त कारणों का विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट है कि उपयुक्त कारणों में से अधिकांश कारणों को नियंत्रित किया जा सकता है लोगों में इन कारणों के प्रति जागरूकता ला करके दिव्यांगता के दर को नियंत्रित किया जा सकता है। 
(लेखक वरिष्ठ परामर्शदाता, एआरटी सेंटर,  एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू है।) 
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