भवानजी ने किसान कृषि सुरक्षा बिल के प्रति शुरू किया जन-जागरूकता अभियान

मुंबई : भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा मुंबई मनपा के पूर्व उपमहापौर बाबूभाई भवानजी ने कृषि सुरक्षा बिल के विरोध में पिछले तेईस दिनों से जारी किसान संगठनों के आंदोलन पर चिंता जताते हुए अब जागरूकता अभियान* शुरू कर दिया है। भवानजी ने कहा है कि किसान आंदोलन का 22 दिन से ज्यादा समय बीत चुका है। इस दौरान इस आंदोलन और किसानों की मांगो को लेकर जो गतिरोध बना हुआ है, वह चिंता का विषय है। विशेषकर इसलिए कि इसने दिल्ली की  ऐसी घेराबंदी की है, कि रोज़मर्रा की जरूरी वस्तुएं

दिल्ली नहीं पहुंच पा रही हैं। जिससे दिल्ली वालों की कठिनाई बढ़ रही है। भवानजी ने कहा कि जिस तरह का अड़ियल और आक्रामक रुख  आंदोलनकारियों का बना हुआ है, इस बात की भी आशंका बनी हुई है, कि कुछ उल्टा-सीधा ना हो जाय।  हिंसा ना हो जाय। उन्होंने कहा कि अब यह मामला देश के सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है। वहां भी यह सवाल उठा है कि किसानों को प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन राह रोकने का नहीं। उच्च न्यायालय ने यह भी जानना चाहा है कि यदि हिंसा हुई, तो कौन जिम्मेदार होगा। प्रदर्शनकारियों के खेमे में और सरकार के खेमे में दोनों और किसान आंदोलन को लेकर लगातार बैठकें चल रही हैं। सतत हलचल हो रही है, लेकिन अभी भी समाधान दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि आंदोलन को लेकर दो तरह का प्रवाह सामने आ रहा है।किसानों का एक वर्ग आंदोलन को लेकर काफी मुखर है, जबकि दूसरा वर्ग इससे पूरी तरह दूर अपने  दैनिक कामकाज में लगा हुआ है। जानकारों में भी इसे लेकर अलग-अलग प्रवाह है। कोई इसे किसानों के हित में मान रहा है, और यह सही है किसानों को यह बताने  के लिए आंदोलन कर रहा है, जबकि हरियाणा, पंजाब और दिल्ली के आसपास के इलाकों के अधिकांश किसान इसे उनके लिए सही नहीं मानते, और इसे रद्द कराने पर अमादा हैं। जिनकी गाड़ी में तमाम अवसरवादी शक्तियां सवार हो गयी हैं, और स्थिति  को जटिल बनना रही हैं। भवानजी ने कहा कि रही बात केंद्र सरकार की, तो उसकी ओर से बातचीत के कई चक्र चले। यही नहीं, कहीं यदि जरूरी हुआ, तो किसानों द्वारा उठाये जा रहे मुद्दों और आशंकाओं पर उनके द्वारा बदलाव और संशोधन की भी तैयारी दर्शायी गयी। इन सबके बावजूद किसानों का कृषि सुरक्षा बिल को रद्द करने पर अड़ना सही नहीं है। भवानजी ने कहा कि सरकार और सत्तारुढ़ दल ने भी  समाधान के प्रयास जारी रखते हुए यह कानून कैसे देश के किसानों के हित में है, यह देश को बताना शुरू कर दिया है। अब मामला उच्च न्यायालय के सामने  है। तब तक सरकार को यह गतिरोध तोड़ने और जनता को सही जानकारी उपलब्ध हो, इस दिशा में ज़ोरदार प्रयास करने और *जागरूकता अभियान* चलाने की जरूरत है। कारण आज भी हमारे किसानों में ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा है, जो कानून की बारीकियों को समझने में अक्षम हैं। हो सकता है 

कि ऐसे किसानों को अब तक बिचौलिए के रूप में  माल काटने वाले निहित स्वार्थी तत्व, किसान संगठनों और राजनीतिक दलों में शामिल बिचौलियों के शुभचिंतक उन्हें गुमराह कर रहे हों। भवानजी ने कहा कि हमारे यहां ऐसे खेल होना कोई नई बात नहीं है।  बदलाव प्रगति के लिए आवश्यक है। यह एक ध्रुव सत्य है, लेकिन हमारे वामपंथी दल और सक्रिय विभिन्न यूनियन हमेशा बदलाव को लेकर विरोधी स्वर अलापने वाले रहे हैं। रही बात विपक्ष की तो हमारे  यहां का विपक्ष आजादी के बाद कुछेक अपवादों को छोड़ दें, तो वह सिर्फ विरोध के लिए विरोध। किसी नई व्यवस्था से किसका भला है, या किसका नुकसान

है, यह ध्यान देने की बजाय हर मुद्दे पर विरोध में  खडा होना इनका सदैव चरित्र रहा है, तो आज भी कुछ नया नहीं हो रहा है। इन्हें भी पता है कि रास्ता बातचीत से ही निकलेगा, लेकिन ध्येय वह नहीं है। इन्हें तो अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी है, तो जब तक बातचीत से समाधान नहीं होता, तब तक *किसानों को इस नए कानून को लेकर जागरूक बनाना* ही सबसे कारगर उपाय है। जब उन्हें लगेगा कि इससे उनका नुकसान नहीं फायदा है, तो अपने आप इनका समर्थन कम हो जाएगा, और अड़ियल प्रदर्शन समाप्त हो जाएगा।

Comments