के जे सोमैया कॉलेज ऑफ इंजिनियरिंग और गोदावरी बायोरिफाइनरीज लिमिटेड ने स्थायी पर्यावरण की दिशा में कदम बढ़ाया

मुंबई : देश में खासकर उत्तर भारत में पराली जलाना प्रदूषण उत्पन्न करने के प्रमुख स्रोतों में से एक है। साल दर साल बढ़ता प्रदूषण मनुष्यों के साथ-साथ अन्य प्राणियों के स्वास्थ्य के लिये भी गंभीर खतरा बन चुका है। इसलिए सरकार पराली जलाने से हो रहे प्रदूषण की रोकथाम के लिये गंभीरता से समाधान ढूंढ रही है। इस बीच के जे सोमैया कॉलेज ऑफ इंजिनियरिंग और गोदावरी बायोरिफाइनरीज लिमिटेड धान का भूसा जलाने के हानिकारक प्रभावों को कम करने में मदद के लिये एक समाधान लेकर आये हैं। इंस्टिट्यूट की मेकैनिकल डिपार्टमेन्ट फैकल्टी प्रोफेसर शिवांगी विराल ठक्कर ने धान के भूसे से पल्प और टेबलवेयर जैसे उपयोगी उत्पाद बनाने का प्रस्ताव दिया है। इस तीन वर्षीय परियोजना का अनुमोदन और फंडिंग डिपार्टमेन्ट ऑफ साइंस एंडटेक्‍नोलॉजी ने की है। 

पराली अपशिष्ट के प्रबंधन के प्राथमिक उद्देश्य के साथ यह परियोजना प्लास्टिक के स्थान पर कृषि उत्पादों के उपयोग का लक्ष्य भी रखती है, ताकि प्लास्टिक बैन की एक अन्य राष्ट्रीय समस्या दूर हो सके। इस परियोजना में धान के भूसे का पल्प बनाने के लिये प्रोसेस ऑप्टिमाइजेशन किया जाएगा, ताकि पर्यावरण-हितैषी टेबलवेयर बनाया जा सके। इस प्रक्रिया में चावल के भूसे की पल्पिंग कर सिलिका और पल्प को अलग किया जाएगा। इसके बाद मिले पल्प से 100 प्रतिशत जैव-अपघटन-योग्य टेबलवेयर बनाया जाएगा। 

इस परियोजना के बारे में प्रोफेसर शिवांगी विराल ठक्कर, मेकैनिकल डिपार्टमेन्ट फैकल्टी, के जे सोमैया कॉलेज ऑफ इंजिनियरिंग और इस परियोजना की प्रिंसिपल इनवेस्टिगेटर, ने कहा, ‘‘पराली अपशिष्ट का प्रबंधन हमारे शोध का प्राथमिक लक्ष्य है, जबकि प्लास्टिक और पारंपरिक कागजों को कृषि उत्पादों से रिप्लेस करने से प्लास्टिक और थर्माकोल बैन की एक अन्य राष्ट्रीय समस्या दूर होगी। पारंपरिक टेबलवेयर और कागजों को रिप्लेस करने के लिये इन उत्पादों का परीक्षण किया जाएगा।’’ 

सोमैया विद्याविहार यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर वी. एन. राजशेखरन पिल्लई ने कहा, ‘‘वैश्विक मापदंड पर प्रत्येक राष्ट्र विकास के संदर्भ में स्थायी रुख अपनाने के लिये काम कर रहा है। सोमैया विद्याविहार यूनिवर्सिटी में हम अपने कैम्पस में स्थायी वातावरण के साथ हैं और इस प्रवृत्ति को राष्ट्रीय स्तर पर दोहराना चाहते हैं। व्यापक स्तर की यह परियोजना प्रदूषण की समस्या को ठीक से सम्बोधित करेगी और हर जगह स्थायी विकास को बढ़ावा देगी, जिससे जन-साधारण को लाभ होगा। लंबी अवधि में इससे दुनिया बेहतर बनेगी।’’

डॉ. रमेश शेट्टार (गोदावरी बायोरिफाइनरीज लिमिटेड) ने कहा, ‘‘आज धान की पराली का प्रबंधन एक चुनौतीपूर्ण काम बन गया है, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड्स द्वारा बैन होने के बावजूद पराली जलाने का काम जारी है। धान के भूसे को बार-बार जलाने से मिट्टी का कटाव भी होता है, क्योंकि वह गर्म हो जाती है और उसकी नमी, उपयोगी माइक्रोब्स, तलछट और कण खो जाते हैं और मिट्टी के जैविक द्रव्य के खोने से उसकी संरचना बिगड़ जाती है।’’

उन्होंने आगे कहा, ‘‘उत्तर भारत के अधिकांश किसान पराली के प्रबंधन के लाभप्रद विकल्पों को लेकर जागरूक नहीं हैं और इसलिये वे पराली जलाने को ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प समझते हैं। इस प्रकार बड़े जागरूकता कार्यक्रमों की जरूरत महसूस होती है, ताकि किसानों को आर्थिक रूप से वहन करने योग्य विकल्पों की उपलब्धता की जानकारी दी जाए और पराली जलाने के कुप्रभाव बताए जाएं।’’

पराली के प्रबंधन के लिये एकीकृत प्रबंधन दृष्टिकोण चाहिये, जिसमें कई रणनीतियों का मिश्रण हो। गोदावरी बायोरिफाइनरीज लिमिटेड धान समेत सभी कृषि अपशिष्टों को बायो-कम्पोजिट और फूड ग्रेड टेबलवेयर में बदलने के लिये बहुत काम कर रहा है, ताकि प्लास्टिक के उपयोग से बचा जा सके। 

भारत विश्व में चावल के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है और विश्व का 20 प्रतिशत चावल उत्पादन भारत में होता है। चावल (धान) का लगभग 150-225 एमएमटी भूसा प्रतिवर्ष अपशिष्ट के रूप में उत्पन्न होता है। चावल का लगभग 70-80 एमएमटी भूसा किसान जला देते हैं। अकेले पंजाब में प्रतिवर्ष चावल का 20 एमएमटी भूसा होता है। एक टन भूसा जलाने से 3 किलो पार्टिक्युलेट मैटर, 60 किलो CO, 1460 किलो CO2, 199 किलो राख और 2 किलो SO2 निकलती है, जिससे फेफड़ों के और श्वसन रोग होते हैं और लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। धान के भूसे को बार-बार जलाने से मिट्टी का कटाव भी होता है।

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