10 में से 8 लोग करते हैं विज्ञापनों पर भरोसा - एएससीआई-आईएसए की संयुक्त रिपोर्ट में हुआ खुलासा

मुंबई : एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) और इंडियन सोसायटी ऑफ एडवर्टाइजर्स (आईएसए) के एक अध्ययन में यह पाया गया है कि लोगों में विज्ञापनों को लेकर काफी भरोसा है। इस अध्ययन को नील्‍सन ने संचालित किया था। एएससीआई मुख्य रूप से ईमानदारी और सच्चाई सुनिश्चित कर एडवर्टाइजिंग में भरोसा बनाये रखने और बढ़ाने पर केन्द्रित रहा है। गौरतलब है कि एएससीआई की स्थापना आईएसए के सहयोग से हुई थी।

‘ट्रस्ट इन एडवर्टाइजिंग’ अध्ययन मेट्रोज और उससे छोटे कस्बों समेत भारत के 20 शहरों के विभिन्न आयु वर्गों के लोगों के साथ किया गया था। इस अध्ययन से पता चला कि 10 में से आठ लोगों ने मीडिया में एडवर्टाइजिंग के मेसैजेस पर भरोसा किया।

टेलीविजन (94 प्रतिशत) एडवर्टाइजिंग के उपभोग का सबसे आम माध्यम था, जिसके बाद डिजिटल (82 प्रतिशत), प्रिंट (77 प्रतिशत) और रेडियो (29 प्रतिशत) का नंबर आता है। टीवी विज्ञापनों की व्यूवरशिप नॉन-मेट्रो मार्केट्स से चलती है। दिलचस्प बात यह है कि डिजिटल पर विज्ञापनों की व्यूअरशिप ग्रामीण क्षेत्रों (82 प्रतिशत) और मेट्रोज (83 प्रतिशत) में एक जैसी है। नील्‍सन में स्‍ट्रैटेजिक अलायंसेज और न्यू वर्टिकल्स के ग्लोबल हेड प्रसून बसु के अनुसार, यह देश के भीतरी क्षेत्र में इस माध्यम का बढ़ता महत्व और केन्द्रीयता दर्शाता है। एएससीआई को इसका पता पहले ही लग गया था कि डिजिटल कंटेन्ट और एडवर्टाइजिंग का बढ़ता उपभोग उपभोक्ता के व्यवहार और मार्केटिंग में स्थायी बदलाव करेगा। तदनुसार, उसने प्रिंट और टीवी एडवर्टाइजिंग की निगरानी के साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्‍स के लिये निगरानी की मजबूत प्रणालियाँ स्थापित कीं। अब वह भ्रमित करने वाले मेसैजेस के लिये 3000 से ज्यादा डिजिटल प्लेटफॉर्म्‍स की स्कैनिंग करता है। 

पारंपरिक मीडिया पर दिखने वाली एडवर्टाइजिंग को उपभोक्ताओं से उच्च स्तर का भरोसा मिलना जारी है। अखबारों की एडवर्टाइजिंग (86 प्रतिशत) पर सबसे ज्यादा भरोसा किया जाता है, जिसके बाद टीवी (83 प्रतिशत) और रेडियो (83 प्रतिशत) का नंबर आता है। टेक्स्ट/एसएमएस विज्ञापनों पर भरोसा 53 प्रतिशत है, जो कम है।

बदलाव के संदर्भ में, उपभोक्ताओं ने नील्‍सन द्वारा साल 2015 में किये गये इसी प्रकार के सर्वे की तुलना में टीवी, प्रिंट, रेडियो, सोशल मीडिया, आउटडोर और सर्च इंजिनों पर उपभोग किये जाने वाले विज्ञापनों पर ज्यादा भरोसा जताया, लेकिन इस अवधि में टेक्स्ट मेसैजेस पर विश्वास करने वाले उपभोक्ताओं का प्रतिशत घटा है (58 प्रतिशत बनाम 52 प्रतिशत)। 

अलग-अलग सेक्टर्स की बात करें, तो दर्शकों ने शैक्षणिक संस्थानों के विज्ञापनों के लिये बहुत उच्च स्तर का भरोसा दिखाया है, जो 82 प्रतिशत है। संभवतः इसका कारण भारत की संस्कृति में शिक्षा को दिया जाने वाला महत्व है, क्योंकि उससे भविष्य सुरक्षित होता है। खराब बात यह है कि एएससीआई को शिक्षा के क्षेत्र से आने वाले भ्रामक विज्ञापन बड़ी संख्या में मिले हैं। इसलिये एएससीआई शिक्षा के क्षेत्र की एडवर्टाइजिंग पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। 

एएससीआई की सेक्रेटरी जनरल मनीषा कपूर ने कहा, ‘‘इन परिणामों को देखते हुए एज्युकेशन सेक्टर की निगरानी का एएससीआई काम ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत में सबसे गरीब लोग भी अन्य जरूरतों की तुलना में शिक्षा पर होने वाले खर्च को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। अधिकांश शैक्षणिक संस्थान नौकरी की गारंटी का वादा करते हैं या नंबर 1 होने का झूठा दावा करते हैं या बिना किसी ठोस डाटा या प्रमाण के 100 प्रतिशत प्लेसमेन्ट की गारंटी देते हैं। ऐसी गलत एडवर्टाइजिंग को बाजार से हटाने के लिये हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं।’’

होम केयर प्रोडक्ट्स, जैसे डिटर्जेंट, मॉस्किटो रिपेलेंट, आदि को भी एक सेक्टर के तौर पर तुलनात्मक रूप से उच्च स्तर का भरोसा मिला है। हालांकि, रियल एस्टेट के विज्ञापनों पर उपभोक्ताओं ने कम भरोसा जताया है।  

जवाब देने वाले लगभग 70 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे उन विज्ञापनों पर भरोसा करते हैं, जिन्‍हें सेलीब्रिटीज द्वारा एंडोर्स करते हैं।

भ्रामक या नाराज करने वाले विज्ञापन देखने पर कार्रवाई करने के संदर्भ में लगभग एक-तिहाई उपभोक्ता अपने परिवार/दोस्तों से चर्चा करते हैं, अन्य एक-तिहाई सोशल मीडिया पर पोस्ट कर या इसकी सूचना देकर यही कार्रवाई करते हैं। हालांकि, लगभग 30 प्रतिशत उपभोक्ता कुछ नहीं करते हैं। यह भी एएससीआई का एक प्रमुख फोकस एरिया है। उसने उपभोक्ताओं के लिये विज्ञापनों में भ्रामक दावों को समझना आसान बनाने के लिये हर उपलब्ध टूल का उपयोग किया है। उपभोक्ता उसकी वेबसाइट (www.ascionline.org) पर या ईमेल (contact@ascionline.org) के माध्यम से शिकायत दर्ज कर सकते हैं। उपभोक्ता व्हाट्सएप (7710012345) के माध्यम से भी शिकायतें भेज सकते हैं।

विज्ञापन उद्योग के स्व-नियामक निकाय के तौर पर एएससीआई ने पिछले 35 वर्षों में नैतिक और जिम्मेदार एडवर्टाइजिंग को बढ़ावा देने के लिये कोड्स और गाइडलाइंस स्थापित की हैं और परिणामस्वरूप उपभोक्ताओं के भरोसे का उच्च स्तर सुनिश्चित किया है। यह कोड्स और गाइडलाइंस मार्केटिंग और उपभोक्ताओं के बदलते परिदृश्य के अनुसार समय के साथ विकसित हुए हैं।

कपूर ने कहा, ‘‘मैं आईएसए को ‘ट्रस्ट इन एडवर्टाइजिंग’ स्टडी का संयुक्त संयोजक बनने के लिये धन्यवाद देती हूँ। एएससीआई को लगता है कि एडवर्टाइजिंग में उपभोक्ताओं का भरोसा बनाये रखना तथा ईमानदारी और प्रभावपूर्णता से एडवर्टाइज करने के लिये ब्राण्ड्स को गाइड करना भी उसकी जिम्मेदारी है। उपभोक्ताओं का भरोसा और ब्राण्ड की प्रतिष्ठा किसी भी ऑर्गेनाइजेशन की सबसे मूल्यवान संपत्तियों में शामिल हैं और ईमानदारी से एडवर्टाइजिंग करना लंबी अवधि के लिये ब्राण्ड वैल्यू बनाने की कुंजी है। स्व-विनियमन का यही आधार है। इस अध्ययन ने कुछ बहुत रोचक परिणाम दिये हैं, जो यह समझने में ब्राण्ड्स की मदद करेंगे कि उपभोक्ताओं के भरोसे का अच्छा स्तर सुनिश्चित करने के लिये उन्हें कहाँ ज्यादा ध्यान देना चाहिये। एएससीआई एक स्वतंत्र स्व-विनियामक है, जिसके लिये इस अध्ययन में कई जानकारियाँ हैं, जो उपभोक्ताओं के साथ बेहतर तरीके से जुड़ने में हमारी मदद करेंगी।’’

आईएसए के चेयरमैन सुनील कटारिया के अनुसार, ‘‘ब्राण्ड्स का निर्माण उपभोक्ताओं और दर्शकों के साथ लंबी अवधि के संवाद से होता है। यह सुनिश्चित करना एडवर्टाइजर्स के अपने हित में है कि पूरा संवाद ईमानदारी और सच्चाई वाला हो, ताकि उपभोक्ता विज्ञापन के संदेशों पर भरोसा कर सकें और ब्राण्ड्स पर भी। यह अध्ययन विज्ञापन करने वालों, एजेंसियों, मीडिया मालिकों और प्लानर्स की यह समझने में मदद करता है कि अच्छा काम कैसे होता है और कहाँ सुधार की जरूरत है।’’

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