समय मुश्किल जरूर है पर, सोचे तो हर समस्या का हल भी है

- इंदु सिंह 'इंदुश्री'


'मेरे कारण मेरा परिवार कई आर्थिक दिक्कतों का सामना कर रहा है। मैं अपने परिवार के लिए बोझ हूँ। मेरी शिक्षा एक बोझ है। यदि मैं पढ़ाई नहीं कर सकती, तो मैं जीवित नहीं रह सकती'।


तेलुगु भाषा में यह सुसाइड नोट लिखकर देश के नामी शिक्षण संस्थान श्रीराम कॉलेज की बीएससी गणित (ऑनर्स) की एक 19 वर्षीय छात्रा ऐश्वर्या रेड्डी ने 2 नवंबर को तेलंगाना में आत्महत्या कर ली क्योंकि, लॉकडाउन के कारण वह पढ़ाई जारी रखने में सक्षम नहीं थी । इस एक घटना को पढ़े तो इससे जुड़े अनेक पहलू जेहन में आते है जिन पर गहन विश्लेषण व चिंतन कर दर्दनाक हादसे के मूल में पहुंचा जा सकता व भविष्य में इस तरह की दुखद घटनाओं को होने से रोका भी जा सकता है । दरअसल, कोरोना महामारी की वजह से मार्च से ही स्कूल व कॉलेज बन्द जो अब तक शुरू नहीं हो पाए व ऐसे हालातों में छात्र-छात्राओं की पढ़ाई ऑनलाइन मोबाइल या लैपटॉप के जरिये हो रही है । ऐसी परिस्थिति में समस्या यह उत्पन्न होती कि, हमारा देश जो दुनिया के मानचित्र में एक पिछड़ा व गरीब राष्ट्र माना जाता वही जनसंख्या के मामले में अव्वल से थोड़ा नीचे जो अनेक समस्याओं की वजह जिसमें कोरोना जैसी आपदा ने असमय आकर बढ़ोतरी ही की है । किसी तरह सरकार साक्षरता अभियान व विविध सरकारी योजनाओं के माध्यम से शिक्षा को बढ़ावा देने में लगी उसके बावजूद भी स्थिति अधिक संतोषजनक नहीं उस पर तालाबंदी ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी क्योंकि, ऑनलाइन स्टडी के लिए सबके पास सुविधाएं नहीं कि इसके लिए जो भी आधुनिक साधन मौजूद वह सबके बजट के अंदर नहीं है ।


भले ही सस्ते मोबाइल उपलब्ध हों लेकिन, जिनकी वार्षिक कमाई ही 30 या 40 हजार हो वह किस तरह इतनी ही कीमत के गेजेट्स ले सकते और यदि किसी तरह मोबाइल ले ले तो फिर उसे हर महीने रिचार्ज करवाना उसके लिए कठिन उस पर ग्रामीण इलाकों में तो नेटवर्क मिलना भी आसान नहीं तो लॉक डाउन के कारण इस तरह की कई भीषण समस्याओं ने भी जन्म लिया जिसको अभी लोग समझ ही नहीं पा रहे तो उसका निदान किस तरह से निकालेंगे कि शिक्षा आज भी जरूरतमन्दों व गरीबों की प्राथमिकता में सबसे नीचे होती है । अचानक सामने आने वाली इस दिक्कत से सामना होने पर लोग समझ ही नहीं पा रहे कि क्या किया जाए जिसके साइड इफेक्ट तरह-तरह से सामने आने लगे कहीं मजदूरों के पलायन की कष्टप्रद तस्वीरें नजर आईं तो कहीं लोगों के काम-धंधे बन्द होने से बेरोजगारी बढ़ी तो कहीं गरीबी में आटा गीला होने लगा और उसके साथ ही स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए लैपटॉप या मोबाइल का जुगाड़ करना आसमान के तारे तोड़कर लाने जितना असाध्य लक्ष्य हो गया जो स्वप्न में भी सम्भव नहीं था । हालांकि, सरकार हर साल प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को लैपटॉप व मोबाइल का निःशुल्क वितरण भी करती फिर भी वह पर्याप्त नहीं कि जितने इस देश में अध्ययनरत विद्यार्थी उनके मुकाबले यह संख्या ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही कही जाएगी जिसकी पूर्ति में लम्बा समय लग सकता और दूसरी तरफ धीरे-धीरे तालाबंदी की अवधि भी बढ़ती जा रही तो ऐसे में निराशा व हताशा किसी को भी आत्मघाती कदम उठाने के लिए मजबूर कर सकती है ।


ऐश्वर्या रेड्डी भी इनमें से एक जो 12वीं में 98.5 फ़ीसदी अंक लाई लेकिन, परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति ने उसे तोड़ दिया जब उसके पिता ऑनलाइन पढाई के लिए लैपटॉप की व्यवस्था नहीं कर सके जबकि, वह पढ़-लिखकर आईएएस ऑफिसर बनने के ख्वाब देखा करती थी परन्तु, उसे साकार करने के पहले ही उसने मजबूरन जो किया वह भी सही नहीं कि मिसालें तो केवल हालातों से लड़कर जीतने वालों की दी जाती और इतिहास भी उन्हें ही अपने पन्नों पर स्थान देता जो सांचों में ढलते नहीं बल्कि, पुराने सांचे तोड़कर अपने हिसाब से नए गढ़ लेते वही दूसरों के लिए भी प्रेरणास्त्रोत बनते है । इस तरह ऐश्वर्या रेड्डी की आत्महत्या ने जहां एक तरफ़ व्यवस्था की नाकामियों व कमजोरियों पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए वहीं दूसरी तरफ उसने युवाओं में धैर्य की कमी को इंगित किया जिसमें समय के साथ लगातार गिरावट आती जा रही है । आजकल के किशोर व नवजवानों में संयम का जबरदस्त अभाव वह कठिनाइयों से जूझने का माद्दा खोता जा रहा जबकि, कहते कि विषम हालात इंसान की परीक्षा लेते व उसे मजबूत बनाते तो जो लड़की आईएएस अधिकारी बनना चाहती उसे अपने संकल्प को इतना दृढ़ बना लेना था कि वह इससे टूटने की बजाय अधिक मजबूत होता और वे सभी जो फिलहाल इस तरह की परिस्थिति से गुजर रहे उन्हें भी यह समझने की जरूरत कि आत्महत्या किसी भी समस्या का हल नहीं होता है । इसके साथ ही सरकार को समस्त शिक्षण संस्थाओं को अत्याधुनिक बनाना चाहिए व सभी अध्ययनरत छात्रों को सभी आवश्यक संसाधन निःशुल्क मुहैया करवाना चाहिए अन्यथा इस तरह प्रतिभाएं काल कवलित होती रहेंगी और सिर्फ सरकार नहीं जवाबदेही तो हम सबकी भी बनती है।


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