मोदी के नेतृत्व में पिछले छह वर्षों के दौरान देे ने स्थापित किए कई कीर्तिमान - भवानजी

मुंबई : भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा मुंबई मनपा के पूर्व उपमहापौर बाबूभाई भवानजी ने कहा है कि वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से देश की बागडोर संभाली है, तब से उनकी अगुवाई में भारत ने कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। उन्होंने कहा कि भारत धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो रहा है। भवानजी ने कहा कि कोरोना महामारी के मुश्किल समय में भी भारत की फार्मा इंडस्ट्री ने 150 देशों को दवाइयां भेजी हैं। भारत की वैक्सीन प्रोडक्शन और डिलिवरी की क्षमता पूरी मानवता को इस संकट से बाहर निकालने के काम आएगी। हम भारत में और अपने पड़ोस में फेज थ्री क्लीनिकल ट्रायल पर बढ़ रहे हैं। वैक्सीन की डिलिवरी के लिए कोल्ड चेन और स्टोरेज की क्षमता बढ़ाने में भारत सभी की मदद करेगा।

भवानजी ने कहा कि अगले वर्ष भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बन जाएगा। जिसके बाद भारत सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर भी अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने की प्रतिष्ठा और इसके अनुभव को हम विश्व हित के लिए इस्तेमाल करेंगे। हमारा मार्ग जनकल्याण से जगकल्याण का है। भारत की आवाज हमेशा शांति सुरक्षा और समृद्धि के लिए उठेगी। भारत की आवाज मानवता, मानवजाति और आतंकवाद, अवैध हथियारों की तस्करी के खिलाफ रही है। उन्होंने कहा कि मोदी के नेतृत्व में पिछले छह वर्षों के दौरान रिफॉर्म, परफॉर्म, ट्रांसफॉर्म के मंत्र के साथ भारत ने करोड़ों भारतीयों के जीवन में बड़े बदलाव लाने का काम किया है। ये अनुभव विश्व के बड़े देशों के लिए भी उपयोगी हैं। 4-5 साल में 400 मिलियन से ज्यादा लोगों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ना, सिर्फ 4-5 साल में 600 मिलियन लोगों को खुले में शौच से मुक्त करना, 2-3 साल में 500 मिलियन से ज्यादा लोगों को मुफ्त इलाज से जोड़ना आसान नहीं था, पर मोदीजी ने इसे करके दिखाया।

वरिष्ठ भाजपा नेता बाबूभाई भवानजी का कहना है कि 1945 की दुनिया आज से एकदम अलग थी। साधन, संसाधन सब अलग था। ऐसे में विश्व कल्याण की भावना के साथ जिस संस्था का गठन हुआ, वो भी उस समय के हिसाब से ही थी। आज हम बिल्कुल अलग दौर में हैं। 21वीं सदी में हमारे वर्तमान की, भविष्य की आवश्यकताएं और चुनौतियां अलग हैं। आज पूरे विश्व समुदाय के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है कि जिस संस्था का गठन तब की परिस्थितियों में हुआ था, वह आज भी प्रासंगिक है। सब बदल जाए और हम ना बदलें तो बदलाव लाने की ताकत भी कमजोर हो जाती है।

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