अवधी गद्य भारत की साहित्यिक सम्पदा ही नहीं लोक धरोहर भी : अखिलेश मिश्र एम्बेसडर भारत सरकार


भाखा पत्रिका के आह्वान पर अन्तर्जालीय अवधी गद्य केन्द्रित संगोष्ठी में बोले वक्ता वृन्द


नोएडा, (उ.प्र.) : अवधी गद्य भारत की साहित्यिक सम्पदा ही नहीं अपितु लोक धरोहर भी है जिसमें विश्व कल्याण व जगत नव निर्माण की असीमित सम्भावनाएँ भी समाहित हैं।


ये बातें अन्तर्राष्ट्रीय भाषा संस्थान सूरत, राष्ट्रीय भाषा शिक्षण व प्रशिक्षण संस्थान कलकत्ता और भाखा तिमाही पत्रिका के आवाह्न पर अवधी गद्य की विधाएँ समस्याएँ और सम्भावनाएँ विषयक एक अन्तर्जालीय संगोष्ठी में एम्बेसडर अखिलेश मिश्र (निवर्तमान अपर सचिव, विदेश मन्त्रालय भारत सरकार) ने बतौर मुख्य अतिथि कही । आगे उन्होंने कहा कि अवधी गद्य साहित्य को समृद्ध बनाने के हितार्थ हर सम्भव सहयोग देने के लिए सदा संकल्पित हूँ और मेरा मानना है कि मातृभाषा से ही राष्ट्रीय प्रगति को अपेक्षानुरूप गतिमान किया सकता है। लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अलका पाण्डेय ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि हमारे अवधी गद्य के साहित्यकारों ने ग्रामीण संस्कृति का सजीव ध्रुवीकरण ही नहीं किया है अपितु भारतीय साहित्य को समृद्ध बनाया है । आकाशवाणी लखनऊ की अधिशासी कार्यक्रम अधिकारी अनामिका श्रीवास्तव ने कहा कि आकाशवाणी सदा से ही लोक भाषाओं के विकास हेतु तत्पर रही है इसी क्रम में अवधी गद्य की तमाम विधाओं को रेडियो रूपक के जरिए लोकप्रिय बनाया गया है।


प्रोफेसर शैलेन्द्र कुमार शुक्ल ने अवधी गद्य की विधाओं पर पर्याप्त रूप से सामाजिक चेतना, वर्गीय चेतना व प्रगतिशील साहित्य का सृजन होने के बावजूद आवश्यकतानुरूप प्रचारित प्रसारित न किये जाने पर चिंता प्रकट की। समीक्षक और पत्रकार पद्म कान्त शर्मा 'प्रभात' ने अवधी गद्य की विधाओं को समाचार पत्रों में स्थान न मिल पाने के प्रति चिंता प्रकट की। उन्होंने आगे कहा कि कम से कम अवधांचल से छपने वाले अखबारों को इस सन्दर्भ में एक पहल ज़रूर करनी चाहिए। प्रो शैलेन्द्र नाथ मिश्र ने कहा कि हमारी अवधी में अवध, अवधि और अवधी समाहित है। अवधी समय की आरधिका है इसलिए यह समयातीत भाषा है।अवधी की चिट्ठी पत्री, मनकही बतकही, उपन्यास नाटक रिपोर्ताज संस्मरण आत्मकथा आदि पर भी काम किया जाए। डा भारतेन्दु मिश्र ने कहा कि अवधी गद्य की विधाओं में समस्याएँ कम सम्भावनाएँ ज्यादा हैं। अवधी डायरी के माध्यम से लगातार प्रयासरत हूँ। विनय कुमार शुक्ल सम्पादक 'भाखा' पत्रिका ने कहा कि भोजपुरी क्षेत्र में रहने के बावजूद भी मै अवधी विकास के लिए समर्पित हूँ । चीन के बाशिंदा आशीष गोरे ने कहा कि 'भाखा' अवधी गद्य के लिए अभिनन्दनीय प्रयास कर रही है। इसलिए आने वाले समय में नये कीर्तिमान गढ़ेगी यह मेरा विश्वास है।


प्रवासी संसार पत्रिका के सम्पादक डा राकेश पाण्डेय ने कहा कि अवधी गद्य विधाओं पर लेखकों को लिखने के लिए प्रेरित किया जाये। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित, प्रख्यात आलोचक व पूर्व प्रोफेसर लखनऊ विश्वविद्यालय ने कहा कि आज भी मध्य वर्ग और निम्न वर्ग के लोग अवधी भाषा में बोलते हैं। इसलिए इनका वर्ण्य विषय बनाकर अवधी गद्य की विधाओं को आम जन तक निरूपित किया जा सकता है और अवधी पत्रिका भाखा परिवार यह नेक काम में जुटा है, इसलिए शुभाशीष देता हूँ तथा उपस्थित समस्त वक्ता व श्रोता वृन्द के प्रति भी शुभकामनाएँ प्रकट करता हूँ। इसके पूर्व इस अन्तर्जालीय अवधी भाषा संगोष्ठी की शुरुआत डा रश्मिशील ने शब्दार्चना से की और लोगों में आध्यात्मिक भाव भरा। भाखा के प्रधान सम्पादक डा गंगा प्रसाद शर्मा' 'गुणशेखर' ने संगोष्ठी पटल पर उपस्थित सभी श्रोताओं वक्ताओं अतिथियों के लिए स्वागत सम्बोधन भी दिया। संगोष्ठी का संचालन अवधी साहित्यकार विनय विक्रम सिंह ने बड़ी ही प्रवाहमयता से किया। उन्होंने आयोजन के अन्त में, "गुड़-भेली जइसी मधुर, महुआ सी मिठुआर। अवधी जस मधु राब सम, गाढ़ी रस कै धार।।" दोहे द्वारा अवधी के माधुर्य को अलंकृत किया, साथ ही एम्बेसडर श्री अखिलेश मिश्र जी के सम्मुख अवधी के उत्कर्ष हेतु एक केंद्रीय पुस्तकालय की स्थापना का प्रस्ताव रखा तथा अवधी या लोकभाषा के साहित्य के प्रकाशन में सरकारी अनुदान व सहयोग हेतु विचार रखा। सबसे अन्त में भाखा पत्रिका के सह सम्पादक देवेन्द्र कश्यप 'निडर' ने आये हुए समस्त अतिथियों, सम्मानित अतिथियों, वक्ताओं और श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया 


इस मौके पर प्रोफेसर शिव प्रसाद शुक्ल,आराध्य शुक्ल, राजेश शुक्ल समेत अन्य अनेक सुप्रसिद्ध लेखक और विचारक मौजूद रहे ।


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