पंडित अतुल शास्त्री से जाने संतान की अनुपस्थिति के बाद कौन कर सकता है आपका श्राद्ध कर्म ?


प्रस्तुति : अनिता शुक्ला


हिन्दू धर्म में मरणोपरांत संस्कारों को पूरा करने के लिए पुत्र का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। शास्त्रों में भी इस बात की पुष्टि की गई है, कि नरक से मुक्ति, पुत्र द्वारा ही मिलती है। अत: पुत्र को ही श्राद्ध, पिंडदान करना चाहिए। यही कारण है कि नरक से रक्षा करने वाले पुत्र की कामना हर माता-पिता करते है। फिर भी ऐसे कई लोग हैं जो पुत्र सुख से विमुख होते हैं। हालांकि ऐसे लोगों को निराश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार पुत्र न होने पर भी कई तरह से श्राद्ध सम्भव है। तो आइए जानते हैं पुत्र कि अनुपस्थ्ती में कौन-कौन श्राद्ध का अधिकारी हो सकता है।



  • पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है।

  • पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में संपिंड श्राद्ध कर सकते हैं।

  • पुत्री का पति एवं पुत्री का पुत्र भी श्राद्ध का अधिकारी हो सकता है।

  • पुत्र के न होने पर पौत्र या प्रपौत्र भी श्राद्ध कर सकते हैं।

  • पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के न होने पर विधवा स्त्री श्राद्ध कर सकती है।

  • पति, अपनी पत्नी का श्राद्ध तभी कर सकता है, जब कोई पुत्र न हो।

  • पुत्र, पौत्र या पुत्री का पुत्र न होने पर भतीजा भी श्राद्ध का अधिकारी हो सकता है।

  • दत्तक या गोद लिया पुत्र भी श्राद्ध कर सकता है।

  • कोई न होने पर राजा को उसके धन से श्राद्ध करने का भी विधान है।

  • किसी के न रहने पर मित्र, शिष्य, कोई रिश्तेदार, कुल पुरोहित भी इस श्राद्ध को कर सकता है।


विष्णु पुराण के अनुसार श्रद्धा भाव से अमावस्या का उपवास रखने से पितृगण ही तृप्त नहीं होते, अपितु ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, विश्वेदेव, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी भी तृप्त होकर प्रसन्न होते हैं। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि श्राद्धपक्ष में किया गया हर तर्पण, पितरों के स्वर्गारोहण के लिए एक-एक सीढ़ी बनाता है।


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