कुंडली के विशेष दोषों के निराकरण का सर्वश्रेष्ठ समय है यह पुरुषोत्तम माह : ज्योतिषाचार्य पंडित अतुल शास्त्री


प्रस्तुति : अनिता शुक्ला


हिंदू धर्म में जहां अधिकमास का विशेष महत्व है, वहीं ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसे काफी विशेष माना जाता है। इस वर्ष जो अधिकमास आने वाला है, उसे काफी शुभ माना जा रहा है। ज्योतिष विद्वानों का मानना है कि ऐसा शुभ संयोग पुरुषोत्तम मास 160 वर्ष बाद बन रहा है और इसके बाद ऐसा शुभ मलमास 2039 में आएगा।


कुंडली दोषों का भी होता है निराकरण। अधिकमास में समस्त धार्मिक कृत्यों, चिंतन-मनन, ध्यान, योग आदि के माध्यम से साधक अपने शरीर में समाहित पांचों तत्वों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान किए गए प्रयासों से समस्त कुंडली दोषों का भी निराकरण हो जाता है।विष्णु मंत्रों का जाप लाभकारी पुराणों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ-हवन के अलावा श्रीमद् देवी भागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, इसीलिए इस पूरे समय में विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है। ऐसा माना जाता है कि अधिक मास में विष्णु मंत्र का जाप करने वाले साधकों को भगवान विष्णु स्वयं आशीर्वाद देते हैं। आइए जानते हैं अतुल शास्त्री जी से उस  मलमाल या अधिकमास क्यों कहा जाता है। इसका क्या धार्मिक महत्व है और भगवान राम के नाम पर इसे पुरुषोत्तम मास क्यों कहा जाता है।


3 साल में एक बार आता है अधिकमास


जब धरती के घूमने के कारण दो वर्षों के बीच करीब 11 दिनों का फासला हो जाता है तो तीन साल में करीब एक महीन के बराबर का अंत आ जाता है। इसी अंतर के कारण हर तीन साल में एक चंद्र मास आता है। हर तीन साल में बढ़ने वाले इस माह को ही अधिकमास या मलमास कहा जाता है। भारतीय हिंदू कैलेंडर मे सूर्य और चंद्र की गणनाओं के आधार पर चलता है। अधिकमास दरअसल चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घंटे के अंतर से आता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार हर सूर्य वर्ष 365 दिन और 6 घंटे का माना जाता है। वहीं चंद्र वर्ष 365 दिनों का माना जाता है। यानी दोनों में करीब 11 दिनों का अंतर होता है, जो तीन वर्ष में एक माह के लगभग हो जाता है। इसी कारण इसे अधिकमास कहा जाता है।


शुभ नहीं माना जाता है मलमास


हिंदू धर्म के मुताबिक अधिकमास को पवित्र कार्य के लिहाज से शुभ नहीं माना जाता है। अतिरिक्त माह होने के कारण इसे मलिन मास भी कहा जाता है। हिंदू धर्म के विशिष्ट संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवित, विवाह और अन्य सामान्य धार्मिक संस्कार अधिकमास में नहीं किए जाते हैं। मलिनमास होने के कारण ही इसका नाम मलमास पड़ा है।


भगवान राम के नाम पर पड़ा नाम 'पुरुषोत्तम मास'


अध‍िक मास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अध‍िक मास को पुरूषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। इस विषय में एक बड़ी ही रोचक कथा पुराणों में पढ़ने को मिलती है। कहा जाता है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए। चूंकि अध‍िक मास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ, तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार ना हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने ऊपर लें। भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मल मास के साथ पुरुषोत्तम मास भी बन गया।


ये संस्कार किए जा सकते हैं अधिकमास में


यूं तो अधिकमास में कई संस्कार का आयोजन वर्जित होता है, लेकिन कुछ ऐसे संस्कार है जिनको मलमास के दौरान भी संपन्न कराया जा सकता है। संतान जन्म के कृत्य जैसे गर्भाधान, पुंसवन, सीमंत आदि संस्कार किए जा सकते हैं। इसके अलावा यदि किसी मांगलिक कार्य की शुरुआत की जा चुकी है और मलमास आ जाता है तो भी उस मांगलिक कार्य को पूरा किया जा सकता है। इस दौरान विवाह नहीं हो सकता है लेकिन युवक-युवतियों के रिश्ते देखे जा सकते हैं।


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