इंजीनियर कन्हैया झा की अर्धांगिनी पंचतत्वों में समाईं, अभियन्ता-दिवसे के दिन पति को करना पड़ा अंतिम संस्कार


परिवार और शुभचिन्तकों के आसूओं से दिखी शोक की महानदी


रिपोर्ट : सलिल पांडेय


मीरजापुर, (उ0प्र0) : वाराणसी  देवों के देव महादेव की नगरी है और इस नगरी पर उनकी निरन्तर अनुकंपा भी बरसती है लेकिन खुद महादेव यहां मातृशक्ति की महत्ता प्रतिपादित और स्थापित करने के लिए *'भिक्षां देहि अन्नपूर्णे'* के भाव में पार्वती स्वरूपा अन्नपूर्णा देवी के आगे याचक बन जाते हैं। व्याख्याकारों का मानना है कि अन्नमय प्राणशक्ति महादेव को माता पार्वती से ही मिलती थी इसीलिए शक्ति के बिना शिव अधूरे हैं । शिव का अर्धनारीश्वर रूप का सन्देश ही है कि अर्धांगिनी को पूरे आदर के साथ हृदय में जो धारण करता है, वह शिवजी की कृपा-परिधि में ही वास करता है।


शक्ति का पुरुष प्रत्यावर्तन


धर्मशास्त्रों में शक्ति स्वरूपा नारी की महत्ता के क्रम में उल्लेख मिलता है कि जब कभी कोई नारी सुहागिन रूप में मर्त्यलोक से देवलोक की ओर प्रस्थान करती है तब वह भौतिक शरीर से भले अदृश्य हो जाती है लेकिन जन्मना प्राप्त ममता, करुणा, स्नेह-प्रेम का जो आंतरिक महल है, वह पति के पास ही छोड़ जाती है। महिला शब्द का आशय ही इन गुणों से बने महल से ही लिया जाता है।


हीरा जैसा अर्धनारीश्वर रुप दे गईं पति कन्हैया झा को


यहां अपनी प्रबल जिजीविषा शक्ति से वर्षों से मृत्यु के देवदूतों को अपने घर के द्वार से वापस कर रहीं PWD के मिर्जापुर के अधिशाषी अभियंता श्री कन्हैया झा की पत्नी श्रीमती हीरा झा अंततः पितृपक्ष की प्रदोष-तिथि को देवलोक चलने के प्रस्ताव को ठुकरा नहीं सकीं । प्रतीत होता है की श्रीमती हीरा झा, जो काव्य लेखन में रुचि लेती थीं, उन्हें यमदूतों ने पितृपक्ष का काव्यमय हवाला दिया और किडनी, शूगर तथा इसके चलते  विविध अन्य अस्वस्थतताओं से निरन्तर संघर्ष कर रही हीरा झा सुहाग के श्रृंगार के साथ मणिकर्णिका घाट के लिए निकल पड़ी।


मंगलवार अभियन्ता दिवस के दिन अभियन्ता पति के हाथों स्वर्गलोक बनाने चली गईं


निधन का अर्थ ही है कि जिसका निधन हुआ, उससे जुड़े परिवार के लोग निर्धन हो गए। जीते-जी कोई स्नेह की आंख बंद कर ले, फेर ले तो असहनीय वेदना होती है। ऐसी स्थिति में सदा-सदा के लिए आंख बंद करने की वेदना को कह पाना मुश्किल ही है। उसे सिर्फ अपने लोग महसूस करते हैं। इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता ।


काशी के विद्वान राजनेता पं कमलापति त्रिपाठी के भाव


काशी के अविस्मरणीय व्यक्तित्वों में राजनेता पं कमलापति त्रिपाठी की विद्वत्ता की गूंज निरन्तर होती रहती है। उनकी अर्धांगिनी भी कम उम्र में जब संसार से चल बसीं और आजादी आंदोलन के दौरान मुंबई जेल की काल-कोठरी में उन्हें यह जानकारी दी गई तब उनके मुख से निकला- 'बाबा विश्वनाथ, बड़े कृपालु हो, अपना अर्धनारीश्वर रूप दे दिया । अभी तक मैं अपने बच्चों का पिता ही था, अब मुझे मां भी बना दिया।' यही मन्तव्य उन दिनों अपने 12 साल के पुत्र लोकपति त्रिपाठी को लिखकर भेजा था। ज्ञान के पर्याय कमलापति जी जानते थे कि आयु पर किसी का वश नहीं।


कन्हैया झा के यहां दिखी शोक की गंगा


जैसे ही यह सूचना तेज चलती हवाओं की तरह फैली, लोग श्री झा के यहां पहुचने लगे । विन्ध्याचल मण्डल ही नहीं बल्कि काशी प्रांत कहे जाने वाले दर्जनों जिलों से वरिष्ठ अभियंता से लेकर कर्मचारी तक शाम होते होते उनके सारनाथ स्थित आवास पर पहुंच गए । मणिकर्णिकाघाट पर सविधि अंतिम संस्कार हुआ। स्वर्गीया हीरा झा एक पुत्री और एक पुत्र की मां थीं। पूरे परिवार सहित संतानों की अश्रुधारा में उपस्थित लोगों के भी आंसू शामिल हो गए लिहाजा एक नदी बन गई जो शोक-नदी ही कही जाएगी।


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