यथार्थ गीता में स्वामी अड़गड़ानन्द जी महराज के विचार


- सलिल पांडेय


धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ।।


अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र और संयम रूपी संजय। अज्ञान मन के अंतराल में रहता है। अज्ञान से आवृत्त मन धृतराष्ट्र जन्मांध है, किंतु संयम रूपी संजय के माध्यम से वह देखता है, सुनता है और समझता है कि परमात्मा ही सत्य है, फिर भी जब इससे उत्पन्न मोह रूपी दुर्योधन जीवित है, इसकी दृष्टि सदैव कौरवों पर रहती है, विकारों पर रहती है।....


एक अवसर मिला तो महाराजश्री ने कुछ प्रश्न के लिए कहा। अंतर्मन विद्वान महापुरुष से प्रश्न के लिए अनुमति नहीं दे रहा था।


महराजश्री के कहने पर कुछ सवाल करो, तब किया गया प्रश्न।


प्रश्न - महराजश्री, अगर देखा जाए तो हर पिता धृतराष्ट्र है। अपनी संतान के गलत से गलत कार्यों के पक्ष में खड़ा रहता है। गलत आकांक्षाओं की पूर्ति करता है तब धृतराष्ट्र ही की निंदा क्यों ?


महराज श्री का जवाब - जो पिता ऐसा करता है, उस पुत्र की गति भी दुर्योधन जैसी हो जाती है। वह तथा परिवार संकट में पड़ता है।


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