संवेदना का पाठ पढ़ाती है ईदगाह कहानी, कथा सम्राट प्रेमचंद की जयंती मनाई गई


चुनार किले में 'प्रेमचन्द साहित्य संस्थान' स्थापित हो


रिपोर्ट : सलिल पांडेय


मिर्जापुर, (उ0प्र0) : कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर उनकी कहानी 'ईदगाह' के अत्यंत संवेदनशील पक्ष का मंचन किया गया। जिसमें एक छोटे बच्चे द्वारा अपनी आकांक्षाओं को त्याग कर परिवार की बूढ़ी काकी के प्रति अपनाए गए उत्तरदायित्व का निर्वहन किया गया था।


नगर के तिवराने टोला स्थित डॉ भवदेव पांडेय शोध संस्थान में कथा एवं उपन्यास सम्राट की जयंती पर कहा गया कि मुंशी जी गरीबी के बावजूद वे नैतिक दृष्टि से बेहद संपन्न थे। अपनी कहानियों में अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ़ वे सामन्तशाहों को आधार लेकर कलम चलाते थे।  मिर्जापुर के चुनार के किले में अंग्रेजों के जमाने में चलने वाले बन्दीगृह में जेल में बंद लोगों के बच्चों को पढ़ाया भी करते थे। चुनार में उन्होंने देखा कि किस प्रकार ब्रिटिश हुक्मरान आसपास के गांव के लोगों खासकर महिलाओं का शोषण एवं दुराचरण कर रहे हैं। उनके मन में इसका गहरा असर पड़ा और उनकी कहानियों में अन्याय, शोषण के खिलाफ विचार ज्यादा होते थे।


ईदगाह कहानी में ईद के अवसर पर जहां गांव के बच्चे मेला देखने में मनोरंजन कर रहे हैं और खेल का सामान तथा खानेपीने में पैसा खर्च कर रहे हैं, वहीं कहानी का मुख्य पात्र छोटी उम्र का हामिद अपनी बूढ़ी काकी के लिए चिमटा खरीद कर उच्च उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता है। इसी के साथ चिमटे के माध्यम से फौलादी ताकत अर्जित करने एवं चिमटे के दोनों हिस्सो की तरह दोनों भुजाओं को बलिष्ठ बनाने का संदेश भी दे रहे हैं ताकि भारत माता जो अंग्रेजों की यातना से जल रही हैं, उसका मुकाबला किया जा सके।


इस अवसर पर कहा गया कि वे अपने जीवन में सत्य के पथ पर चले, इससे उनमें आत्मबल पैदा होगा। प्रारंभ में सलिल पांडेय ने प्रेमचंद का जीवन परिचय दिया। अंत में चुनार किले में उनके नाम पर 'हिंदी साहित्य सभागार बनाने की मांग की गई।


Comments