नियमानुसार चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकता हाईकोर्ट


प्रयागराज : उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड ने सन् 2018 में पुरुष व महिला कॉन्स्टेबल भर्ती-2018 का विज्ञापन निकाला था। चयन प्रक्रिया के दौरान हुए मेडिकल एग्जामिनेशन में याची मनीष कुमार सफल नहीं हो सका। अतः याची ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर संबंधित विभाग के लिए दिशा निर्देश की मांग करते हुए आग्रह किया कि उसे फिर से मेडिकल एग्जामिनेशन में बैठने का अवसर दिया जाए, साथ ही उसकी सीट तब तक सुरक्षित रखी जाए, जब तक उसका मामला हल नहीं हो जाता, लेकिन न्यायालय की एकलपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याची का कॉन्स्टेबल पद पर कोई दावा सिद्ध नहीं होता, क्योंकि वह उक्त पद के लिए निर्धारित मेडिकल टेस्ट में सफल नहीं हो सका था। निजी चिकित्सक की रिपोर्ट के अनुसार याची पूर्ण स्वस्थ है तथा नौकरी करने के योग्य है, लेकिन विभाग के मेडिकल बोर्ड के अनुसार याची बीमार और अस्वस्थ है।


मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट को अपीलेट मेडिकल बोर्ड के सामने रखा और उक्त बोर्ड ने भी याची के मेडिकल एग्जामिनेशन को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने मेडिकल बोर्ड द्वारा लिए गए निर्णय की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे निर्णय को महत्व देना चाहिए। न्यायालय द्वारा याचिका खारिज होने के 211 दिन बाद याची ने विशेष अपील दाखिल की, जिसमें उसने उच्च न्यायालय की एकल पीठ द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी। सरकारी अधिवक्ता ने (राज्य सरकार व अन्य बनाम राहुल) एक मुकदमे का हवाला देते हुए कहा कि अगर विभाग द्वारा चयन प्रक्रिया नियमानुसार, पूरी सावधानी के साथ संपन्न कराई जा रही है, तो उस पर एक संभावित आवेदक की शिकायत पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता। जब आवेदक का चयन मेडिकल फिटनेस पर आधारित है और विभाग द्वारा उसके लिए मेडिकल बोर्ड की स्थापना की गई है और मेडिकल बोर्ड की क्रियाविधि पर किसी अन्य अभ्यर्थी द्वारा प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया गया है, तो ऐसे में बोर्ड  के निर्णय को मनमाना या दुर्भावनायुक्त नहीं कहा जा सकता। दोनों पक्षों के द्वारा प्रस्तुत तथ्यों को सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने विशेष अपील खारिज कर दी।


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