जन्माष्टमी के शुभ मुहूर्त, कब मनाए, कैसे मनाए जन्माष्टमी? आइए जानते हैं ज्योतिषाचार्य अतुल शास्त्री


प्रस्तुति : अनीता शुक्ला


सिंहराशिगते सूर्ये गगने जलदाकुले। मासि भाद्रपदे अष्टम्यां कृष्णपक्षेअर्धरात्रिके। वृषराशि स्थिते चन्द्रे, नक्षत्रे रोहिणी युते।।’


श्रीमद्भागवत् पुराण, श्रीभविष्य पुराण, अग्नि, विष्णु सहित सभी धर्मग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी, नक्षत्र एवं वृष राशिस्थ चन्द्रमाकालीन अर्धरात्रि के समय हुआ था। 


कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है। जब-जब ऐसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त सम्प्रदाय के लोगो के लिये और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव सम्प्रदाय के लोगो के लिये होती है।


स्मार्त – वे सभी जो वेद-पुराणों के पाठक, आस्तिक, पंच देवों (गणेश, विष्णु, शिव, सूर्य व दुर्गा) के उपासक व गृहस्थ हैं, स्मार्त के अंतर्गत आते हैं। इस मत को मानने वाले 11 को जन्माष्टमी मनाएंगे व्रत भी रखेंगे।


वैष्णव – जिन लोगों ने किसी विशेष संप्रदाय के धर्माचार्य से दीक्षा लेकर कंठी-तुलसी माला, तिलक आदि धारण करते हुए तप्त मुद्रा से शंख-चक्र अंकित करवाए हों, वे सभी वैष्णव के अंतर्गत आते हैं। इस मत को मानने वाले 12 को जन्मोत्सव मनाएंगे, व्रत भी रखेंगे।


जन्माष्टमी व्रत एवं पारण का सिद्धांत


स्मार्त अनुयायियों के लिये, हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु में, जन्माष्टमी के दिन को निर्धारित करने के लिये स्पष्ट नियम हैं। श्रद्धालु जो वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी नहीं हैं, उनको जन्माष्टमी के दिन का निर्णय हिन्दु ग्रन्थ में बताये गये नियमों के आधार पर करना चाहिये। वैष्णव धर्म को मानने वाले लोग अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र को प्राथमिकता देते हैं और वे कभी सप्तमी तिथि के दिन जन्माष्टमी नहीं मनाते हैं। वैष्णव नियमों के अनुसार हिन्दु कैलेण्डर में जन्माष्टमी का दिन अष्टमी अथवा नवमी तिथि पर ही पड़ता है। इन नियमों में निशिता काल को, जो कि हिन्दु अर्धरात्रि का समय है, को प्राथमिकता दी जाती है। जिस दिन अष्टमी तिथि निशिता काल के समय व्याप्त होती है, उस दिन को प्राथमिकता दी जाती है। इन नियमों में रोहिणी नक्षत्र को सम्मिलित करने के लिये कुछ और नियम जोड़े जाते हैं। जन्माष्टमी के दिन का अन्तिम निर्धारण निशिता काल के समय, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के शुभ संयोजन, के आधार पर किया जाता है। जन्माष्टमी का मुहूर्त मुख्य रूप से अष्टमी देखा जाता है उसके उपरांत रोहिणी नक्षत्र का पालन किया जाता है. जन्माष्टमी का पारण सूर्योदय के पश्चात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद किया जाना चाहिये। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होते तो पारण किसी एक के समाप्त होने के पश्चात किया जा सकता है। यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में से कोई भी सूर्यास्त तक समाप्त नहीं होता तब जन्माष्टमी का व्रत दिन के समय नहीं तोड़ा जा सकता। ऐसी स्थिति में व्रती को किसी एक के समाप्त होने के बाद ही व्रत तोड़ना चाहिये। भाद्रपद कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में श्री विष्णु की सोलह कलाओं से पूर्ण होकर भगवान श्री कृष्ण अवतरित हुए थे। श्री कृष्ण का प्राकट्य आततायी कंस एवं संसार से अधर्म का नाश करने हेतु हुआ था। भविष्योत्तर पुराण में कृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर से कहा कि मैं वासुदेव एवं देवकी से भाद्रपक्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को उत्पन्न हुआ जबकि सूर्य सिंह राशि में एवं चंद्रमा वृषभ राशि में था और नक्षत्र रोहिणी था।
कृष्ण भगवान का जन्म समय रात्रि का माना जाता है अतः इस व्रत में जन्मोत्सव रात्रि को मनायी जाती है। इस व्रत में प्रमुख कृत्य हैं उपवास, कृष्ण पूजा, जागरण एवं पारण। व्रत के दिन प्रातः व्रती को सूर्य, चंद्र, यम, काल, दो संध्याओं, पंच भूतों, पांच दिशाओ के देवों का आहवान करना चाहिए, जिससे वे उपस्थित हों। अपने हाथ में जलपूर्ण ताम्रपात्र रखकर उसमें कुछ फल, पुष्प, अक्षत लेकर संकल्प करना चाहिए कि मैं अपने पापों से निवृत्ति एवं जीवन में सुख प्राप्ति हेतु इस व्रत को करू। व्रत करते हुए रात्रि को कृष्ण जन्म उत्सव मनाते हुए भजन एवं कीर्तन करना चाहिए। जन्माष्टमी का व्रत करने से जीवन से सभी प्रकार से शाप एवं पाप की निवृत्ति होती है तथा सुख तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है।


चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं।


जन्माष्टमी व्रत



  • इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए कि उपवास के पहले दिन सात्विक कम भोजन करें।

  • रात्रि में ब्रह्मचर्य का पालन करें।

  • व्रत के दिन स्नानादि नित्यकर्म करके सूर्यादि सभी देव दिशाओं को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर मुख बैठें।

  • भगवान श्रीकृष्ण को वैजयंती के पुष्प अधिक प्रिय है अतः जहां तक बन पडे़ वैजयंती के पुष्प अर्पित करें और पंचगंध लेकर व्रत का संकल्प करें।

  • कृष्णजी की मूर्ति को गंगा जल से स्नान कराएं। फिर दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, केसर के घोल से स्नान कराकर फिर शुद्ध जल से स्नान कराएं। फिर सुन्दर वस्त्र पहनाएं।

  • रात्रि बारह बजे भोग लगाकर पूजन करें व फिर श्रीकृष्णजी की आरती उतारें।

  • उसके बाद भक्तजन प्रसाद ग्रहण करें।

  • व्रती दूसरे दिन नवमी में व्रत का पारणा करें।

  • जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को दक्षिणावर्ती शंख से भी अभिषेक कर सकते हैं

  • सुगंधित पदार्थों से युक्त करें आरती

  • " ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय " मंत्र का जाप करें


महाफलदायी होता है जन्माष्टमी व्रत, सभी मनोकामनाएं होती हैं पूर्ण


मान्यता है कि भगवान कृष्ण मानव जीवन के सभी चक्रोंय यानि जन्म, मृत्यु, शोक, खुशी आदि से गुजरे हैं इसीलिए उन्हें पूर्णावतार कहा जाता है।


मोहरात्रि


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके विधिपूर्वक पालन से अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाले पुण्य प्राप्त होते हैं। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव निरूसंदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।


व्रत - भक्त जो जन्माष्टमी का व्रत करते हैं जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व केवल एक ही समय भोजन करते हैं। व्रत वाले दिन, स्नान आदि से निवृत्त होने के पश्चात, भक्त लोग पूरे दिन उपवास रखकर, अगले दिन रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के समाप्त होने के पश्चात व्रत कर पारण का संकल्प लेते हैं। कुछ कृष्णभक्त मात्र रोहिणी नक्षत्र अथवा मात्र अष्टमी तिथि के पश्चात व्रत का पारण कर लेते हैं। संकल्प प्रातःकाल के समय लिया जाता है और संकल्प के साथ ही अहोरात्र का व्रत प्रारम्भ हो जाता है। जन्माष्टमी के दिन श्री कृष्ण पूजा निशीथ समय पर की जाती है। वैदिक समय गणना के अनुसार निशीथ मध्यरात्रि का समय होता है। निशीथ समय पर भक्त लोग श्री बालकृष्ण की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। विस्तृत विधि-विधान पूजा में षोडशोपचार पूजा के सभी सोलह चरण सम्मिलित होते हैं।


अतः अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के अन्त समय के आधार पर कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत दो सम्पूर्ण दिनों तक प्रचलित हो सकता है। हिन्दु ग्रन्थ धर्मसिन्धु के अनुसार जो श्रद्धालुजन लगातार दो दिनों तक व्रत करने में समर्थ नहीं है वो जन्माष्टमी के अगले दिन ही सूर्योदय के पश्चात व्रत को तोड़ सकते हैं।


12 अगस्त को जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाएगा


इस दिन अष्टमी की तिथि और नक्षत्र कृतिका है. चंद्रमा इस दिन मेष राशि में रहेंगे. आइए जानते हैं ज्योतिषाचार्य पंडित अतुल शास्त्री से जन्माष्टमी के शुभ मुहूर्त और श्री कृष्णा के जन्म की कथा के बारे में,



  • अष्टमी तिथि आरम्भ : 11 अगस्त 2020,

  • मंगलवार, सुबह 09 बजकर 09 मिनट से

  • अष्टमी तिथि समाप्त : 12 अगस्त 2020 बुधवार सुबह 11 बजकर 17 मिनट तक

  • जन्माष्टमी पूजा मुहूर्त 11 अगस्त, 2020

  • निशिता पूजा का समय : 12:05 से 12:47,

  • 12 अगस्त अवधि : 00 घण्टे 43 मिनट

  • जन्माष्टमी पर राहुकाल दोपहर 12:27 बजे से 02:06 बजे तक रहेगा


इस बार जन्माष्टमी पर कृतिका नक्षत्र रहेगा, उसके बाद रोहिणी नक्षत्र रहेगा, जो 13 अगस्त तक रहेगा


जन्माष्टमी का पर्व 12 अगस्त को है. इस बार जन्माष्टमी का पर्व बेहद विशेष है. पंचांग के अनुसार इस दिन वृद्धि योग का निर्माण हो रहा है. ग्रहों की स्थिति की बात करें तो इस दिन सूर्य कर्कराशि में रहेंगे.जन्माष्टमी के दिन को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं.


मथुरा और द्वारका में 12 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जाएगी। जबकि उज्जैन, जगन्नाथ पुरी और काशी में 11 अगस्त को उत्सव मनाया जाएगा। हर बार की तरह इस बार भी जन्माष्टमी दो दिन मनाई जा रही है। 11 और 12 अगस्त दोनों दिन जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जा रहा है। लेकिन 12 अगस्त को जन्माष्टमी मानना श्रेष्ठ है।


अपनी राशि के अनुसार भगवान का पूजन करें, तो उन्हें श्रेष्ठ फलों की प्राप्ति होती है


मेष : राशि वालों को राधाकृष्णजी का गंगाजल से अभिषेक करना चाहिए. कृष्ण-कन्हैया को दूध से बनी हुई मिठाई, नारियल के लड्डू एवं माखन मिश्री का भोग लगाना चाहिए. साथ ही तुलसी की माला से 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः' मंत्र का यथासंभव जाप करना चाहिए. इस मंत्र के जाप के बाद यथासंभव में अगर प्रसाद में अनार अर्पित किया जाये, तो मेष राशिवालों को कार्यों में सर्वोत्तम सफलता मिलेगी. 


वृष : राशि वाले को भगवान श्रीकृष्ण का पंचामृत से अभिषेक करके उन्हें दूध से निर्मित मिठाई, रसगुल्ले आदि का भोग लगाना चाहिए. कमलगट्टे की माला से 'श्रीराधाकृष्ण शरणम मम्' मंत्र की 11 माला का जाप करना चाहिए. भगवान को मखाने का भोग लगाना चाहिए. इससे वृषभ राशि वाले जातकों की जीवन में मनवांछित फल की प्राप्ति होगी


मिथुन : राशि वाले भगवान श्रीकृष्ण का दुग्ध से अभिषेक करके उन्हें पंचमेवा काजू से निर्मित मिठाई और केले का भोग लगाना चाहिए. साथ ही 'श्रीराधायै स्वाहा' मंत्र की तुलसी या स्फटिक की 11 माला का जप करें. फलों में पीले केले को अर्पित करें. इससे आपके जीवन में मान सम्मान और यश की वृद्धि होगी. 


कर्क : राशि के जातकों को भगवान राधेकृष्ण का अभिषेक कर केसर और खोये या काजू की बर्फी का भोग लगाना चाहिए. साथ ही 'श्रीराधा वल्लभाय नमः' मंत्र की पांच माला का जाप करें. फलों में पानीवाला नारियल चढ़ाएं. इससे घर परिवार में सुख-समृद्धि की वृद्धि होगी और सुख की प्राप्ति होगी.  


सिंह : राशि वाले को भगवान श्रीकृष्ण का गंगाजल में शहद मिलाकर अभिषेक करके उन्हें लाल-पीले और गुड़ का भोग लगाना चाहिए. साथ ही 'ॐ विष्णवे नमः' मंत्र का जाप करें. बादाम, मिश्री और फल शिव को अर्पित करें. इससे सभी क्षेत्र में अपार सफलता प्राप्त होगी और विरोध भी कुछ नहीं कर पाएंगे. 


कन्या : राशि वाले को भगवान श्रीकृष्ण का दूध में घी मिलाकर अभिषेक करना चाहिए. साथ ही मेवा या दूध से बनी हुई मिठाई का भोग लगाना चाहिए. 'ह्रीं श्रीं राधा ही स्वाहा' मंत्र का 11 माला का जप करें. भगवान कृष्ण को लौंग, इलायची, तुलसी का पत्ता, हरा पान और कोई हरा फल भोग में लगाएं. इससे आपके जीवन में सुख-समृद्धि में वृद्धि होगी. 


तुला : राशि वाले को भगवान कृष्ण को दूध में शक्कर मिलाकर अभिषेक करना चाहिए और प्रसाद से संबंधित दूध से निर्मित प्रसाद चढ़ाना चाहिए और श्री कृष्णाय नमः मंत्र की माला का जाप करें और महाप्रसाद में बादाम, माखन, मिश्री और केला भोग में लगाएं. इससे जीवन में तमाम परेशानियां धीरे-धीरे स्वत: समाप्त समाप्त हो जायेंगी.


वृश्चिक : राशि वालों को भगवान श्रीकृष्ण का पंचामृत से अभिषेक करके गुड़ से बने हुए मिष्ठान का भोग लगाना चाहिए. 'श्री राधा कृष्णाय नमः' मंत्र के कम-से-कम पांच माला का जाप करें. साथ ही पंचमेवा फलों में पानी वाला नारियल भोग में लगाएं. इससे आपके सभी काम आसानी से बनने शुरू हो जायेंगे.


धनु : राशि वाले को भगवान श्रीकृष्ण को शहद और दूध से अभिषेक करके बेसन की मिठाई का भोग लगाना चाहिए और 'ओम नमो नारायणाय नमः' मंत्र की पांच माला का जाप करें. पीला वस्त्र और पीला फल चढ़ाएं. अमरूद चढ़ाएं. 


मकर : राशि वाले को भगवान श्रीकृष्ण को गंगाजल से अभिषेक करके भोग लगाएं. साथ ही 'देवकीसुत गोविंदाय नमः' मंत्र का जाप करें. अंगूर, मीठा पान और केसरवाली मिठाई भोग लगाएं. व्यापार में लाभ की प्राप्ति होगी. 


कुंभ : राशि वाले को भगवान श्रीकृष्ण का पंचामृत से अभिषेक करके उन्हें लालिमायुक्त दूध से निर्मित मिठाई का भोग लगाना चाहिए. 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का 11 बार जाप करना चाहिए. मेवे, बादाम, काजू, किशमिश, पिस्ता, अखरोट का प्रसाद चढ़ाना चाहिए. जीवन के सभी क्षेत्रों में मनवांछित फल की प्राप्ति होगी. 


मीन : राशि वाले को भगवान श्रीकृष्ण का पंचामृत से अभिषेक करके उन्हें मेवा की मिठाई प्रसाद में चुनाव करें. साथ ही 'ओम देवकीसूत गोविंदाय नमः' मंत्र का जाप करें. भगवान को इलायची, नारियल और फल अर्पित करें. 


जन्माष्टमी को सुख-समृद्धि प्राप्ति के लिए करें ज्योतिषाचार्य अतुल शास्त्री द्वारा बताये गयें विशेष उपाय


शास्त्रों के अनुसार श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मणी माँ लक्ष्मी का अवतार थी अत: अगर इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए विशेष उपाय किए जाएं तो माता लक्ष्मी भी प्रसन्न हो जाती हैं और भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। यदि आप जन्माष्टमी के दिन ये उपाय पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास से करेंगे तो आपको अभीष्ट फल की प्राप्ति होगी


श्री कृष्ण जनमाष्टमी के दिन किए जा सकने वाले ज्योतिष उपाय



  • यदि आपकी आमदनी में कोई इज़ाफा नही हो रहा हो और नौकरी में प्रमोशन भी नहीं हो रहा हो तो जन्माष्टमी के दिन सात कन्याओं को घर बुलाकर खीर खिलाएं। यह काम पांच शुक्रवार तक लगातार करें।

  • आर्थिक संकट के निवारण और धन लाभ के लिए जन्माष्टमी के दिन प्रात: स्नान आदि करने के बाद किसी भी राधा-कृष्ण मंदिर में जाकर प्रभु श्रीकृष्ण जी को पीले फूलों की माला अर्पण करें। इससे आर्थिक संकट दूर होने लगते है और धन लाभ के योग प्रबल बनते है ।

  • जन्माष्टमी के दिन प्रात: दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक करें । इसके बाद यह उपाय हर शुक्रवार को करें । इस उपाय को करने वाले जातक से मां लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती हैं। इस उपाय को करने से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती है।

  • जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को सफेद मिठाई, साबुतदाने अथवा चावल की खीर यथाशक्ति मेवे डालकर बनाकर उसका भोग लगाएं उसमें चीनी की जगह मिश्री डाले , एवं तुलसी के पत्ते भी अवश्य डालें। इससे भगवान श्री कृष्ण की कृपा से ऐश्वर्य प्राप्ति के योग बनते है।

  • भगवानश्रीकृष्ण को पीतांबर धारी भी कहलाते हैं, पीतांबर धारी का अर्थ है जो पीले रंग के वस्त्र पहनने धारण करता हो। इसलिए श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन किसी मंदिर में भगवान के पीले रंग के कपड़े, पीले फल, पीला अनाज व पीली मिठाई दान करने से भगवान श्रीकृष्ण व माता लक्ष्मी दोनों प्रसन्न रहते हैं, उस जातक को जीवन में धन और यश की कोई भी कमी नहीं रहती है।

  • जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण जी के मंदिर में जटा वाला नारियल और कम से कम 11 बादाम चढ़ाएं । ऐसी मान्यता है कि जो जातक जन्माष्टमी से शुरूआत करके कृष्ण मंदिर में लगातार सत्ताइस दिन तक जटा वाला नारियल और बादाम चढ़ाता है उसके सभी कार्य सिद्ध होते है, उसको जीवन में किसी भी चीज़ का आभाव नहीं रहता है।

  • जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को पान का पत्ता अर्पित करें फिर उसके बाद उस पत्ते पर रोली से श्री मंत्र लिखकर उसे अपनी तिजोरी में रख लें। इस उपाय से लगातार धन का आगमन होता रहता है ।

  • जन्माष्टमी की रात को 12 बजे भगवान श्री कृष्ण का केसर मिश्रित दूध से अभिषेक करने से जीवन में स्थाई रूप से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है ।

  • अपने जीवन में सभी तरह की सुख समृद्धि प्राप्त करने के लिए जन्माष्टमी के दिन पीले चंदन, केसर, गुलाबजल मिलाकर माथे पर टीका-बिंदी लगाएं। यह काम हर गुरुवार को करें।

  • अगर क़र्ज़ के बोझ तले दबे हुए हो तो श्मशान के कुएं का जल लाकर पीपल के वृक्ष पर जन्माष्टमी से लेकर नियमित रूप से छह शनिवार तक चढ़ाएं।

  • लक्ष्मी कृपा पाने के लिए जन्माष्टमी पर कहीं केले के दो पौधे लगा दें। बाद में उनकी नियमति देखभाल करते रहें। जब पौधे फल देने लगे तो इनका दान करें, स्वयं न खाएं।भगवान श्रीकृष्ण को पीतांबर धारी भी कहलाते हैं, पीतांबर धारी का अर्थ है जो पीले रंग के वस्त्र पहनने धारण करता हो। इसलिए श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन किसी मंदिर में भगवान के पीले रंग के कपड़े, पीले फल, पीला अनाज व पीली मिठाई दान करने से भगवान श्रीकृष्ण व माता लक्ष्मी दोनों प्रसन्न रहते हैं, उस जातक को जीवन में धन और यश की कोई भी कमी नहीं रहती है ।


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