जब मन जानवर होने लगे तब कुर्बानी या बलि की जानी चाहिए !


बकरीद कुर्बानी का पर्व, हिंदुओं में भी दी जाती है बलि


रिपोर्ट : सलिल पांडेय


मिर्जापुर, (उ0प्र0) : बलि (कुर्बानी) का रिवाज हिंदू और इस्लाम दोनों सम्प्रदायों में है। यह बलि इसके प्रतीकार्थ भी हैं। हिन्दूओं के अनेक शक्तिपीठों में बलि की परंपरा अभी भी है। माँ विंध्यवासिनी के प्रसन्नार्थ भी बलि दी जाती है।


हिन्दू धर्म में बलि - दैत्यों के राजा बलि के पास भगवान विष्णु वामन बनके आते है। दान में तीन पग मांगते है। दो पग में धरती-पग ले लेते हैं।  तीसरे में सिर पर पैर रखकर बलि को पाताल लोक भेज देते हैं।


दान में बलि सर्वश्रेष्ठ - बलि के सब कुछ गंवा कर दान की वजह से बलिदान शब्द बना। देश के सुरक्षाप्रहरी जब जान गंवा देते हैं तब उनके इस त्याग को बलिदान कहा जाता है।


बलि का प्रतीक-अर्थ - जीवन में हर सुख का आह्लाद और स्वाद मन को ही मिलता है। यही राजा है। जब यह जानवर बनने लगे तो इसकी तत्क्षण कुर्बानी कर देनी चाहिए। यही बलि या कुर्बानी के पीछे का भाव है।


इस्लाम मज़हब में दो ईद-उल-फितर जिसे मीठी ईद भी कहा जाता है और दूसरी ईद है बक़रा- ईद। इस ईद पर बकरे की क़ुर्बानी की जाती है। वैसे इस ईद को ईद- उल-अज़हा भी कहा जाता है। इसका गहरा संबंध क़ुर्बानी से है। 


खुदा का हुक्म पैग़म्बर हज़रत इब्राहिम को ख़ुदा की तरफ़ से कुर्बानी का जब हुक्म हुआ तब वे बेटे को क़ुर्बानी करने के लिए तैयार हो गए। 


दुम्बा आ गया - क़ुर्बानी के वक़्त हज़रत इस्माईल की जगह एक दुम्बा क़ुर्बान हो गया। ख़ुदा ने हज़रत इस्माईल को बचा लिया और हज़रत इब्राहिम की क़ुर्बानी क़ुबूल कर ली। तभी से हर साल उसी दिन उस क़ुर्बानी की याद में बक़रीद मनाई जाती है और क़ुर्बानी की जाती है। 


सादगी जरूरी - बकरा तन्दुरुस्त और बग़ैर किसी ऐब का हो यानी उसके बदन के सारे हिस्से वैसे ही होना चाहिए जैसे ख़ुदा ने बनाए हैं। सींग, दुम, पाँव, आँख, कान वग़ैरा सब ठीक हों, पूरे हों और जानवर में किसी तरह की बीमारी भी न हो। क़ुर्बानी के जानवर की उम्र कम से कम एक साल का हो।


कुर्बानी में शान न दिखाएं - इस कुर्बानी में झूठी शान और दिखावा नहीं होना चाहिए।  कुछ लोग 10-20 हज़ार से लेकर लाखों का बकरा ख़रीदते हैं, फिर प्रदर्शनी लगाते हैं। जिसका क़ुर्बानी से कोई वास्ता नहीं है। अल्लाह की नजर में मामूली बकरे की क़ुर्बानी भी महत्वपूर्ण है यदि नेकनियती से की जाए। पैसे वालों को अतिरिक्त पैसा जो पैसे की कमी से त्योहार नहीं माना पाते उनकी मदद करनी चाहिए। कुर्बानी के  गोश्त के तीन बराबर हिस्से किए जाएं, एक हिस्सा ख़ुद के लिए, एक शुभचिंतकों और रिश्तेदारों के लिए तथा तीसरा हिस्सा ग़रीबों में बांट देना चाहिए। मीठी ईद पर सद्क़ा और ज़कात दी जाती है तो इस ईद पर क़ुर्बानी के गोश्त का एक हिस्सा ग़रीबों में  बांटा जाता है।


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