" बडा़ ही कठिन है एकाकीपन को जी पाना "


- अमृता पांडे


बडा़ ही कठिन है
एकाकीपन को जी पाना
मनोभाव विचित्र सा है यह
कुछ ना सूझता है प्राणी को
अर्थहीन लगता है जीवन, 
दिन लगने लगते गमगीन
ऐसा लगता है मानो
कारागार में बंदी हो मन
तन तो है आजाद घूमता,
तृप्त नहीं हो पाता मन
मुरझा जाता है जीवन का, 
खिला हुआ सुंदर उपवन......


ऐसा जीवन भी क्या जीवन
तुम्हें भगाना होगा सूनापन
जीवन बनाकर फूलदान
सुंदर भावों से सजाना होगा
सींचते रहना है दिन रात इसे
मधुर मृदुल भावों से......


फिर भी यदि ना कर सको ये
तो कर लो ये स्वीकार अभी
बहने दो खुद को बहाव में
इस एकाकीपन की नदी में
कहीं तो मिलेगा किनारा
देखो प्रकृति का कोई भी रंग
एकाकी नहीं लगता
तारे समूह में चलते हैं
पंछी संग कलरव करते हैं
भौंरे मिल गुंजन करते हैं
है समय बड़ा ही बलशाली
कुछ तो परिवर्तन लाएगा।


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