समाज-परिवर्तन


परिवर्तन ही जीवन है


अनीता गुलेरिया (दिल्ली)


एक कुम्हार हाथों में मिट्टी लेकर काफी देर से सोच-विचार में डूबा हुआ था वह चिलम बनाने की कोशिश कर रहा था,जैसे ही चिलम पूरी तरह से बनकर तैयार हो गई तो उसने अचानक ही चिलम को तोड़ दिया,फिर दोबारा उसी मिट्टी से सुराही बनाने में लग गया,तभी मिट्टी ने कुम्हार से पूछा तुम चिलम बनाते समय किसी गहरी सोच-विचार में डूबे हुए लग रहे थे,लेकिन चिलम के आकार को तोड़ने के लिए मैं तेरा अत्यंत धन्यवाद करती हूं,क्योंकि यदि मेरा आकार चिलम का रहता तो मैं खुद भी सारा दिन जलती और कई लोगों को सारा दिन जलाती रहती,लेकिन अब तुमने मेरी आकृति में परिवर्तन करके मुझे शांति प्रदान की है क्योंकि आकार के बदलते ही मेरा विकार भी खुद-ब-खुद बदल गया है,अब मैं सारा दिन खुद शीतल रहते हुए औरों को भी शीतल करती रहूंगी मेरे इस आकार के विकार को बदलने के पीछे,तुम्हारी बदली हुई सोच है इसी तरह यदि हम अपने समाज को एक अच्छा आकार देने की कोशिश करेंगे,तो उसके विकार में परिवर्तन होना निश्चित तय (लाजमी) है,इसलिए नई अच्छी सोच,नए-विचार सार्थकता की निशानी है इसलिए समाज को बदलने से पहले हमारी अपनी सोच का बदलना अत्यंत जरूरी है ।


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