नागपंचमी : असत्य के सर्पभाव को खत्म कर सत्य को दुग्ध-पान का पर्व


- सलिल पांडेय


विज्ञान के युग में नागपंचमी के दिन नागों की पूजा के वैज्ञानिक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि मनुष्य का जीवन भी विपरीत हालात के सर्पों की मौजूदगी में व्यतीत होता है । आत्मा यदि परमात्मा का अंश है तो काम, क्रोध, मोह, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष आदि किसी सर्प से कम नहीं है । पौराणिक कथाओं में द्वापर के अंतिम राजा परीक्षित को तमाम यज्ञ, अनुष्ठान के बावजूद तक्षक नामक सर्प मार डालता है । परीक्षित अभिमन्यु के पुत्र थे जिन्हें अश्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में ही मार डाला था लेकिन मृत पिंड के रूप में जन्मे परीक्षित को योग-शक्ति से कृष्ण ने बचा लिया था । परीक्षित का आशय ही परीक्षण से है । संसार, आत्मा, परमात्मा के परीक्षण में अविवेक रूपी सर्प के डंसने की आशंका निरन्तर बनी रहती है । विकार रूपी कलियुग जब विवेक रूपी परीक्षित के राज्य में घुसने की कोशिश कर रहा है तो दयाभाव में आकर परीक्षित ने सोना, जुआ, मद्य, स्त्री और हिंसा में कलियुग को स्थान दे दिया । इन्हीं पँचस्थलों से निकलने वाले सर्प मनुष्य के सुखद जीवन को डंसते है ।


जो छल-छद्म में लगे हैं वे मानसिक सर्प हैं


नागपंचमी की पौराणिक कथाओं में नागों के जन्म से ही जहरीले छल-छद्म का माहौल उत्पन्न हो जाता है । महाभारत ग्रन्थ की शुरुआत ही नागों के जन्म से की गई है । आदि पर्व की कथा के अनुसार कश्यप की पत्नी कद्रू तथा विनता एक दूसरे के साथ छल कर रही हैं । माता कद्रू ने अपनी सौत विनता को धोखा देने के लिए श्वेत उच्चैश्रवा घोड़े में लिपट कर कृष्ण वर्ण का होने का शर्त लगाती है । कद्रू के एक हजार पुत्रों में कुछ तो घोड़े में लिपट जाते हैं और घोड़ा कला हो जाता है जबकि कुछ छल करने से इनकार कर देते हैं और जिसे माता कद्रू श्राप देती है । उधर विनता का पुत्र गरुण कद्रू के पुत्रों से बदला लेकर माता को दासत्व से मुक्त करता है । माता कद्रू के श्राप से जब सर्प जलने लगे तब वे ब्रह्मा के पास गए । ब्रह्मा ने श्रावण मास की पंचमी तिथि को सर्पों को वरदान दिया कि तपस्वी जरत्कारु नाम के ऋषि का पुत्र आस्तिक सर्पों की रक्षा करेगा । परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने इंद्र सहित तक्षक को अग्निकुंड में आहुति के लिए मंत्रपाठ किया । आस्तिक ने तक्षक की प्राण-रक्षा की । यह तिथि भी पंचमी ही थी । मान्यता है कि सर्पों की ज्वलनशीलता कम करने के लिए उन्हें दूध से स्नान कराने एवं पूजा करने का विधान बनाया गया । दूध सात्विक तरल पदार्थ है । इसका निहितार्थ स्पष्ठ है कि नकारात्मक के जहर के प्रभाव को सात्विक आचरण की तरलता से खत्म किया जाना चाहिए । सर्पों को दुग्ध से स्नान का मतलब ही असत्य रूपी जहर को सत्य रूपी दुग्ध निष्प्रभावी करना है ।


बढ़ता प्रदूषण भी प्रकृति के लिए सर्प है


इसके अलावा भारत में प्राचीन काल में अनार्य भी खुद को तक्षक जाति का मानते थे और वे नागों की पूजा करते थे ।   महाभारत युद्ध के बाद इनका प्रभाव बढ़ता गया, लेकिन जन्मेजय के प्रभाव के चलते नागवंश का प्रभाव क्षीण हुआ । पंचमी के दिन सर्पों की पूजा के पीछे मनीषियों का दृष्टिकोण शरीर के मुख्य पंच वायु (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान) को योग-विद्या से जहरीले होने से बचाने का भी है । यह वायु शरीर में अनुकूल स्थिति में है तो जीवन मणियुक्त हो जाता है जबकि प्रतिकूल स्थिति में घातक । विकारों का सर्प हमेशा सकारात्मक परिस्थितियों को डंसता रहता है । यह भगवान शिव के गले की तरह हर व्यक्ति के गले में लिपटा रहता है । द्वापर में कालिया नाग ने यमुना के जहर को प्रदूषित कर जहरीला बना दिया । उस कालिया नाग का वध करने कृष्ण यमुना में कूद पड़ते है । आज भी ग्लोबल वार्मिंग से लेकर किसी भी तरह के प्रदूषण को दूर करने के लिए वही आगे आ सकता है जो इन जहरीले नागों की प्रकृति से वाकिफ़ हो । इस दृष्टि से देखा जाय तो सावन महीने में महादेव की पूजा में ज़हरीली परिस्थितियों जिसमें प्रकृति के अलावा सामाजिक स्तर पर स्वार्थ, धोखा एवं राष्ट्रीय स्तर पर आंतकवाद, घातक शस्त्रों की होड़ से जूझने का भी सन्देश निहित है । श्री हनुमान लंका के विषैले परिवेश में जाकर विभीषण रूपी सकरात्मकता ढूंढ लेते है । स्पष्ट होता है कि जहरीलेपन का सामना पंच ज्ञानेन्द्रियों से जुड़े विवेक को जागृत रखकर ही किया जा सकता है अन्यथा दृश्य, श्रवण, गन्ध, स्वाद, स्पर्श  के चलते बुद्धि-विवेक की कुशल परीक्षण शक्ति नष्ट हो जाती है ।


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