Mirzapur : ठहाका प्रसाद दुबे के रूप में विख्यात थे माताप्रसाद दुबे 


जमीन से अंकुरित होकर वट-वृक्ष तक बनने में आघात भी सहते रहे, पर फर्क नहीं पड़ा


झुला झूलने के महीने सावन में पेंग लग्गकर गगन में चले गए, आकस्मिक निधन पर शहर स्तब्ध


रिपोर्ट : सलिल पांडेय


मिर्जापुर, (उ0प्र0) :  जिला कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष 80 वर्षीय माताप्रसाद दुबे खिलखिलाते सावन महीने में अनन्त की यात्रा पर चले गए। सावन महीने का प्रथम मंगलवार उनके व्यापक प्रभामण्डल और लोकमण्डल के लिए स्थायी रूप से अमंगलवार के रूप में हो गया । अपनी मौजूदगी से बोझिल वातावरण को ठहाका में बदलने की सहज स्वभाव के चलते जिले में जन-जन ही नहीं बल्कि जिससे भी वे कभी एक बार मिले होंगे, वे सभी जन उनकी इस यात्रा की जानकारी से बोझिल मन होते देखे जा रहे हैं ।


अंग्रेजी हटाओ आंदोलन से शुरू राजनीतिक यात्रा - स्व माता प्रसाद दुबे 70 दशक के आखिरी वर्ष में समाजवादी आंदोलन के रहनुमा डॉ रामनोहर लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के क्रांतिकारी भगत सिंह ही थे । के बी डिग्री कॉलेज के छात्र नेता से शुरू उनका राजनीतिक जीवन छत्र-धारण तक चला ।


कांग्रेस में आगमन - छात्र राजनीति के बाद कांग्रेस में आकर भी उनकी कार्यशैली तुम मुझे खून दो-मैं तुझे आजादी दूँगा के उद्घोषक नेताजी सुभाषचन्द बोस की तरह था।  जिसने भी उनका साथ दिया उसके लिए अपना गर्दन कटा कर प्रसाद स्वरूप देने में कभी पीछे नहीं रहे स्व माताप्रसाद दुबे ।


कांग्रेस के हनुमान - सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की सरकार से जिले के विकास की अकांक्षा को पूरा करने के लिए उन्होंने राम-लक्ष्मण की खोज की । उस 80 के दशक में जिले की राजनीति में प्रभावी जेल-खेल मंत्री रहे स्व लोकपति त्रिपाठी तथा उनके परम निकट और बाद में मंत्री भी रहे श्री रुद्रप्रसाद सिंह को स्व माताप्रसाद दुबे ने राम-लक्ष्मण की संज्ञा दी। दोनों जहां रहते, दुबे जी की दी उपाधि राम-लक्ष्मण जिंदाबाद गूंज ही जाता था। 


जन-समस्याओं के मामले कूद पड़ते थे, अंजाम भुगतने से पीछे नहीं रहते रहे - स्व दुबे से किसी ने प्रशासनिक उत्पीड़न की शिकायत की तो उसे वे अपना उत्पीड़न मानकर कूद पड़ते थे अंजाम की परवाह किए बिना । लिहाजा कभी कभार प्रशासनिक सख्ती के ये शिकार भी हुए लेकिन न डिगे और न हिले ।


चुनावों में भागीदारी - दुबेजी की कुंडली संभवतः बिना पद के ख्याति की थी, लिहाजा  लोकसभा, विधानसभा एवं पिछली बार नगरपालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़कर सफलता न मिलने के बावजूद जनता के बीच गली-गली जाकर मिलने में ही वे आनन्द का अनुभव करते रहे। कुछ समय के लिए वे कॉग्रेस के तिवारी गुट में भी थे ।


अजात शत्रु -  राजनीतिक उठापठक को छोड़ दिया जाए तो वे अजात-शत्रु थे । माता विंध्यवासिनी के धाम में स्नेह-लगाव, अपनत्व और मोहब्बत का प्रसाद सबको बांटते फिरते उन्होंने दुनियां से मुंह मोड़ लिया। पारिवारिक-संकट भी आए, उसे भी दृढ़ता से झेले लेकिन झूला झूलने के मौसम सावन में पेंग लग्गकर वे गगन में चले गए।


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