"कलम के सिपाही और जमीन से जुड़े कथाकार मुंशी प्रेमचंद"


प्रेमचंद जी ने कहा था - "मैं एक मज़दूर हूँ। जिस दिन कुछ लिख न लूँ, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं"


✍️  गोपाल कृष्ण पटेल


हमारे हिंदी साहित्य को उन्नत बनाने के लिए अनेक कलाकारों ने योगदान दिया है। हर कलाकार का अपना महत्व होता है लेकिन प्रेमचंद जैसा कलाकार किसी भी देश को बड़े सौभाग्य से मिलता है।मुंशी प्रेमचंद जी हमारे प्रिय लेखक हैं। प्रेमचंद जी ने एक दर्जन उच्चकोटि के उपन्यास लिखें हैं और तीन सौ से भी अधिक कहानियाँ लिखकर हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाया है। बहुत से उपन्यासों में गोदान, कर्म भूमि और सेवासदन सभी प्रसिद्ध हैं। कहानियों में पूस की रात और कफन बहुत ही मार्मिक हैं।


मुंशी प्रेमचंद जी के लोक जीवन के व्यापक चित्रण और सामाजिक समस्याओं के गहन विश्लेषण को देखकर कहा जाता हैं कि प्रेमचंद जी के उपन्यासों में भारतीय जीवन के मुंह बोलते हुए चित्र मिलते हैं।प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के पास ‘लमही’ नामक ग्राम में हुआ था । इनके पिता अजायब राय डाकख़ाने में क्लर्क थे । प्रेमचंद जब 8 वर्ष के थे तभी उनकी माँ आनन्दी देवी का स्वर्गवास हो गया ।


प्रेमचंद जमीन से जुड़े हुए कथाकार और उपन्यासकार थे. उनका बचपन काफी संघर्षों भरा था, जो उनकी रचनाओं में भी दीखता है. उन्हें ग्राम्य जीवन की बहुत अनोखी परख थी. उनके उपन्यास गोदान को ग्रामीण संस्कृति का महाकाव्य कहा जाता है. उनका पूरा साहित्य दलित, दमित, स्त्री, किसान और समाज में हाशिये पर जी रहे लोगों की लड़ाई का साहित्य है, जिसमें समता, न्याय, चेतना और सामाजिक परिवर्तन की घोषणा है. आम लोगों की आसान और प्रचलित भाषा उनके लेखन की सबसे बड़ी खासियत थी. इसलिए तो इन्हें कलम का सिपाही भी कहा जाता है।


प्रेमचंद की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में, अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। प्रेमचंद की रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जन साधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियां भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियां हैं।अपनी कहानियों से प्रेमचंद मानव-स्वभाव की आधारभूत महत्ता पर बल देते हैं। उनकी कहानियाँ जन जीवन का मुंह बोलता हुआ चित्र प्रस्तुत करते हैं।


गरीबों के जीवन पर लिखने से उन्हें विशेष सफलता मिली है। प्रेमचंद जी की भाषा सरल है लेकिन मुहावरेदार है। भारत में हिंदी का प्रचार करने में प्रेमचंद के उपन्यासों ने बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने ऐसी भाषा का प्रयोग किया जिसे लोग समझते और जानते थे। इसी वजह से प्रेमचंद जी के अन्य लेखकों की तुलना में अधिक उपन्यास बिके थे।


प्रेमचंद जी को आदर्शवादी यथार्थवादी साहित्यकार कहा जाता है। गोदान को प्रेमचंद जी का ही नहीं बल्कि सारे संसार का सर्वोत्तम उपन्यास माना जाता है। गोदाम में जो कृषक का मर्मस्पर्शी चित्र दिया गया है उसके बारे में सोचकर आज भी मेरा दिल दहल जाता है। सूद-खोर बनिये, जागीरदार, सरकारी कर्मचारी सभी का भेद खोलकर प्रेमचंद जी ने अपने साहित्य को शोषित और दुखी लोगों का प्रवक्ता बना दिया है।


उनके जीवन में वे हमेशा चुनौतियों और मुश्किलों का सामना करते थे। उनके दिल में हमेशा अपने मित्रो के लिये प्रेम भाव होता था और साथ ही गरीब एवं पीडितो के लिये सहानुभूति का सागर भी बसा होता था। प्रेमचंद एक उच्चकोटि के इंसान थे। जीवन में न तो उनको कभी सुख-चैन का विलास मिला और न ही उनकी इसकी तमन्ना थी. तमाम महापुरुषों की तरह वे भी अपना काम स्वयम करना ही पसंद करते थे।


आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्ययन अधूरा होगा। वे एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा सुधी (विद्वान) संपादक थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में, जब हिन्दी में की तकनीकी सुविधाओं का अभाव था, उनका योगदान अतुलनीय है। प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं।


प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि विभिन्न साहित्य रूपों में प्रवृत्त हुई। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न प्रेमचंद ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की। प्रमुखतया उनकी ख्याति कथाकार के तौर पर हुई और अपने जीवन काल में ही वे ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि से सम्मानित हुए। उन्होंने कुल १५ उपन्यास, ३०० से कुछ अधिक कहानियाँ, ३ नाटक, १० अनुवाद, ७ बाल-पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की लेकिन जो यश और प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से प्राप्त हुई, वह अन्य विधाओं से प्राप्त न हो सकी। यह स्थिति हिन्दी और उर्दू भाषा दोनों में समान रूप से दिखायी देती है।सादे एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचंद हमेशा मस्त रहते थे। 


"खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है, जीवन नाम है- आगे बढ़ते रहने की लगन"


 


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