आइए जानतें हैं ज्योतिषाचार्य पंडित अतुल शास्त्री से कौन थे जनमेजय और क्यों उन्होंने सांपों के सम्पूर्ण विनाश की प्रतिज्ञा ली थी


राजा परीक्षित को ऋषि ने दिया शाप


महाभारत के युद्ध के बाद कुछ सालों तक पांडवों ने हस्तिनापुर पर राज किया। लेकिन जब वो राजपाठ छोड़कर हिमालय जाने लगे तो राज का जिम्मा अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को दे दिया। परीक्षित ने पांडवों की परंपरा को आगे बढ़ाया। लेकिन यहां पर विधाता कोई और खेल, खेल रहा था। एक दिन मन उदास होने पर राजा परीक्षित शिकार के लिए जंगल गए थे। शिकार खेलते-खेलते वह ऋषि शमिक के आश्रम से समीप से गुजरे। ऋषि उस वक्त ब्रह्म ध्यान में आसन लगा कर बैठे हुए थे। उन्होंने राजा की ओर ध्यान नहीं दिया। इस पर परीक्षित को बहुत तेज गुस्सा आया और उन्होंने ऋषि के गले में एक मरा हुआ सांप डाल दिया। जब ऋषि का ध्यान हटा तो उन्हें भी बहुत गुस्सा आया और उन्होंने राजा परीक्षित को शाप दे दिया कि तुम्हारी मौत सांप के काटने से ही होगी। राजा परीक्षित ने इस शाप से मुक्ति के लिए तमाम कोशिशे की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।


कैसे हुई राजा परीक्षित की मौत


राजा परीक्षित ने हर मुमकिन कोशिश की, कि उनकी मौत सांप के डसने से न हो। उन्होंने सारे उपाय किए और ऐसी जगह पर घर बनवाया जहां परिंदा पर तक न मार सके। लेकिन ऋषि का शाप झूठा नहीं हो सकता था। जब चारों तरफ से राजा परीक्षित ने अपने आपको सुरक्षित कर लिया तो एक दिन एक ब्राह्मण उनसे मिलने आए। उपहार के तौर पर ब्राह्मण ने राजा को फूल दिए और परीक्षित को डसने वला वो काल सर्प ‘तक्षक’ उसी फूल में एक छोटे कीड़े की शक्ल में बैठा था। तक्षक सांपों का राजा था।  मौका मिलते ही उसने सर्प का रुप धारण कर लिया और राजा परीक्षित को डस लिया। राजा परीक्षित की मौत के बाद राजा जनमेजय हस्तिनापुर की गद्दी पर विराजे, जनमेजय पांडव वंश के आखिरी राजा थे।


जनमेजय का नाग यज्ञ


जनमेजय को जब अपने पिता की मौत की वजह का पता चला तो क्रोध में आकर उसने धरती से सभी सांपों के सर्वनाश करने का प्रण ले लिया और इस प्रण को पूरा करने के लिए उसने विशाल सर्पमेध यज्ञ का आयोजन किया और विश्व भर के पंडित व ऋषियों को आमंत्रित किया। इस यज्ञ के मंत्रो के प्रभाव से ब्रह्मांड के सारे सांप हवन कुंड की अगनि में आकर गिरने लगे। तक्षक इससे डरकर इंद्र देव की शरण में चला गया। इस पर जनमेजय ने अपने ऋषियों से कहा कि इंद्र यदि तक्षक को न छोड़े, तो उसे भी तक्षक के साथ खींच लाओ और यज्ञ में भस्म कर दो। ऋषियों के मंत्र पढ़ने पर तक्षक के साथ इंद्र देव भी खिंचने लगे। तब इंद्र देव ने डरकर तक्षक को छोड़ दिया। लेकिन सांपों का राजा तक्षक, जिसके काटने से परीक्षित की मौत हुई थी, खुद को बचाने के लिए अब सूर्य देव के रथ से लिपट गया। तब यज्ञ शक्ति से जनमजेय के ऋषियों ने उनको भी खींचना शुरू कर दिया और सूर्य भगवान के हवन कुंड में गिरने का अर्थ था सूर्य के अस्तित्व की समाप्ति जिसकी वजह से सृष्टि की रोशनी समाप्त हो सकती थी।


नाग यज्ञ की समाप्ति


यह देखकर सूर्यदेव और ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए सभी देवता जनमेजय से इस यज्ञ को रोकने का आग्रह करने लगे लेकिन जनमेजय किसी भी हालत में अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहता था। पौराणिक इतिहासकार लिखते है कि इस समस्या के समाधान के लिये एक मंत्रणा की गयी और यह तय हुआ कि सभी देवता मिलकर अस्तिका मुनि से निवेदन करेंगे। जनमेजय के यज्ञ को रोकने के लिए अंत में देवताओं की आग्रह पर अस्तिका मुनि को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिनके पिता एक ब्राह्मण और मां एक नाग कन्या थी।


अस्तिका मुनि ने जनमेजय से पूछा कि माना आपके पिता के साथ जो हुआ, वो ठीक नहीं था, परन्तु क्या किसी एक प्राणी की गलती की वजह से उसके समस्त कुल वो प्रजाति का विनाश कर देना उचित हैं | जनमेजय को अपनी गलती का अहसास हुआ और अस्तिका मुनि की बात जनमेजय को माननी पड़ी और सर्पमेध यज्ञ को समाप्त कर तक्षक को मुक्त करना पड़ा | जनमेजय के क्रोध को शान्त करने के लिए अस्तिका मुनि एक काली मंदिर में होकर पूजा के लिये गये और उनका क्रोध दूर किया इसके बाद राजा जनमेजय ने सम्पूर्ण राज – पाट त्याग कर सन्यास ग्रहण कर लिया  जनमेजय को अनजाने में ही ब्रह्म-हत्या का दोष लग गया था। उसका सभी ने तिरस्कार किया। वह राज्य छोड़कर वन में चला गया। वहां उसका साक्षात्कार इन्द्रोत मुनि से हुआ। उन्होंने भी उसे बहुत फटकारा। जनमेजय ने अत्यंत शांत रहते हुए विनीत भाव से उनसे पूछा कि अनजाने में किये उसके पाप का निराकरण क्या हो सकता है तथा उसे सभी ने वंश सहित नष्ट हो जाने के लिए कहा है, उसका निराकरण कैसे होगा? इन्द्रोत मुनि ने शांत होकर उसे शांतिपूर्वक प्रायश्चित्त करने के लिए कहा। उसे ब्राह्मणों की सेवा तथा अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने के लिए कहा। जनमेजय ने वैसा ही किया तथा निष्पाप, परम् उज्ज्वल हो गया। परीक्षित-पुत्र जनमेजय सुयोग्य शासक था। बड़े होने पर उसे उत्तंक मुनि से ज्ञात हुआ कि तक्षक ने किस प्रकार परीक्षित को मारा था जिस प्रकार रूरू ने अपनी भावी पत्नी को आधी आयु दी थी वैसे परीक्षित को भी बचाया जा सकता था। मन्त्रवेत्ताकश्यप कर्पंदंशन का निराकरण कर सकते थे पर तक्षक ने राजा को बचाने जाते हुए मुनि को रोककर उनका परिचय पूछा। उनके जाने का निमित्त जानकर तक्षक ने अपना परिचय देकर उन्हें परीक्षा देने के लिए कहा। तक्षक ने न्यग्रोध (बड़) के वृक्ष को डंस लिया। कश्यप ने जल छिड़ककर वृक्ष को पुन: हरा-भरा कर दिया। तक्षक ने कश्यप को पर्याप्त धन दिया तथा जाने का अनुरोध किया। कश्यप ने योगबल से जाना कि राजा की आयु समाप्त हो चुकी है, अत: वे धन लेकर लौट गये। यह सब जानकर जनमेजय क्रुद्ध हो उठा तथा उत्तंक की प्रेरणा से उसने सर्पसत्र नामक यज्ञ किया जिससे समस्त सर्पों का नाश करने की योजना थी। तक्षक इन्द्र की शरण में गया। उत्तंक ने इन्द्र सहित तक्षक का आवाहन किया। जरत्कारू के धर्मात्मा पुत्र आस्तीक ने राजा का सत्कार ग्रहण कर मनवांक्षित फल मांगा, फलत: राजा को सर्पसत्र नामक यज्ञ को समाप्त करना पड़ा।


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