सन्त कबीर कुरीतियों के कोरोना बीमारी के उपचार करने वाले चिकित्सक जैसे हैं



  • कंकर-पत्थर जुटा कर श्रेष्ठ बनने की होड़ में पर्यावरण असंतुलित

  • कबीर जयंती और पर्यावरण दिवस पर नए दौर का मंथन-चिंतन

  • कोरोना से बचाव और पर्यावरण शुद्धि के लिए हुआ हवन


रिपोर्ट : सलिल पांडेय


मिर्जापुर, (उ0प्र0) : ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन सन्त कवि कबीरदास की जयंती सन्त और साहित्य के संगम के बीच मनाई गई जिसमें 'सन्त कवियों का कुरीतियों के कोरोना के खिलाफ मेडिकल ट्रीटमेंट' विषय पर चर्चा की गई । इस अवसर पर वायरस के क्षरण और पर्यावरण संरक्षण के लिए हवन पूजन भी किया गया।


नगर के गैबीघाट स्थित मंदिर में सन्त रामानुज दास की अध्यक्षता में कबीर के दोहों और उसी के समानार्थ गोस्वामी तुलसीदास के दोहों एवं चौपाइयों का पाठ भी किया गया। गोष्ठी को सम्बोधित करते रामानुज दास ने कहा कि कबीर सामाजिक विकृतियों के कोरोना का उपचार करते हैं तो गोस्वामी तुलसीदास लोकतांत्रिक पद्धति से सामाजिक बदलाव करना चाहते हैं। कबीर जब नकारात्मकता एवं सकारत्मकता की चर्चा करते हैं तो 'पोथी पढ़ी पढ़ी जुग मुआ पण्डित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय' लिखते हैं और इस दोहे में वे दिखावे पर सीधा प्रहार करते हैं, जबकि तुलसी पूरा रामचरित मानस लिखने के बाद भी कुछ कमी महसूस करते हुए 'कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम, तिमि रघुनाथ निरन्तर प्रिय लागहु मोहि राम' दोहे में सत संस्कारों की पूर्णता का अभाव महसूस करते है और अपने ईष्ट को अनुकम्पा का प्रार्थनापत्र देते हैं। कबीर भी 'दुखिया दास कबीर जागे और रोए' कहते हुए यह व्यक्त करते हैं कि ईष्ट की प्राप्ति में सजगता के बावजूद विकारों का आक्रमण जारी रहता है।



भौतिकता बड़ी जान सस्ती


मुख्य वक्ता के रूप में डॉ भवदेव पांडेय साहित्य शोध संस्थान के संयोजक सलिल पांडेय ने बढ़ती भौतिकता के लिए दोनों सन्त कवियों की दृष्टि को एक ही बताते हुए कहा कि तुलसी भी भौतिकता के लिए छीना-झपटी, डकैती पर पैनी दृष्टि डालते हैं और ' बाढ़े खल बहु चोर जुआरा, जे लम्पट परधन परदारा' चौपाई में अनैतिक उपलब्धियों पर कटाक्ष करते है। उनका मानना है कि अपने परिश्रम की जगह लूट से धन कमाने में लोगों का यकीन बढ़ा है। इसी तरह कबीर 'कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद दिया बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बाग दे क्या बहरा हुआ खुदाय' दोहे में भौतिकता के पीछे पत्थर-मन समाज पर सर्जिकल अटैक करते है। जिसके पास जितना अधिक धन, बड़ा मकान वह इलाके का उतना बड़ा व्यक्ति होने का दावा कर रहा है लेकिन समाज सब कुछ देख रहा है। वे 'पाथर पूजे हरि मिले तो मैं पूजूं पहाड़---' दोहे में विलुप्त होती मानवता पर चिंता प्रकट करते है। मनुष्य की अति भौतिकता से संकट का दौर खड़ा हो गया है। भौतिकता के चक्कर में जान सस्ती हो गई है।


इसी क्रम में जलज नेत ने कहा कि मध्ययुग में शोषण के खिलाफ किया गया यह आंदोलन आज भी प्रासंगिक है, जबकि साकेत पांडेय ने कबीर एवं तुलसी की रचनाओं का पाठ किया। इस मौके पर धर्मराज सेठ, विजय निषाद, दिलीप यादव, प्रमोद कुमार साहू, कन्हैया साहनी, कंचन सेठ, हरिश्चंद्र यादव आदि भी मौजूद रहे।
सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।


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