" सारे गिले शिकवे भूलकर हम फिर से एक हो जाए "


✍  नीलम शर्मा " नीलू "


इस खिड़की को बंद किया है,
जबसे हर रोज ओस में
लिपटकर उभर आता है तुम्हारा ही अक्स…
मुझसे मिलने के लिए बेताब…।


अक्सर बातें किया करती हूँ तुम से में
उन उँगलियों का स्पर्श क्या तुमने महसूस
किया है, अपने चहरे पर…।


क्यों चल पड़ते हैं आज भी एहसास
बन मन कदम तुम्हारी ओर और
भीग जाती हैं आँखें बनकर बारिश
की बूंदें …।


मैं भी ओस का सुबह इंतजार करती हूँ।
काश जिस ओस में तुम्हारा अक्श
बनाती हूँ वो अक्श जीवंत हो जाए
और सारे गिले शिकवे भूलकर
हम फिर से एक हो जाए…।


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