ऋषि मार्कण्डेय के शरीर-विज्ञान (मेडिकल साइंस) का अध्याय है कवच


रिपोर्ट : सलिल पांडेय


।। श्री मां विंध्यवासिन्यै नमः ।।


"स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ।।" श्रीदुर्गासप्तशती में 'देव्या: कवचम्' (कवच) का 29वां श्लोक।


अर्थ- महादेवी दोनों स्तनो की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करे । ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी  उदर में रहकर रक्षा करे।


ऋषि मार्कण्डेय के शरीर-विज्ञान (मेडिकल साइंस) का अध्याय है कवच ।


इस श्लोक में महादेवी से स्तन की रक्षा की प्रार्थना की गई है। स्तन से ही मां अपने रक्त से निर्मित दुग्ध का पान कराकर जीवन देती है। यही दुग्धपान नाभिकुण्ड में एकत्र होता है।  यह कुंड काम, क्रोध, मोह और लोभ से प्रदूषित होता है। योग के ज्ञानी इसी नाभिकुण्ड में एकत्र दूध-माखन की ऊर्जा को सहस्रार में ले जाकर पीयूष-वर्षा कराते है। यही सोमरस है । अतः प्रार्थना की गई है कि इस नाभिकुण्ड को मां दुर्गा सूखने और प्रदूषित न होने दें । महादेवी राजा की पत्नी को भी कहते है । मनुष्य का मन ही राजा है। अतः मन की प्रवृत्तियां धर्मपत्नी की तरह रहें कर्कशापत्नी की तरह नहीं । श्रीकृष्ण की 16 हजार पत्नियों का आशय भी 16 कलाओं की रक्षा हजार हजार रूपों में करने की चेष्टा ही है। 


इसी के साथ मन की रक्षा शोकविनाशिनी देवी से की गई है। जब इष्ट का नाश और अनिष्ट की प्राप्ति होती है तो शोक होता है। शोक मृत्यु के पुत्र का भी नाम है। अतः प्रार्थना की गई है कि मन को शोक प्राप्त न हो, इसलिए महादेवी नकारात्मक जीवन के रास्ते जीवन में आने वाले शोक से बचाएं ।


हृदये ललिता देवी से प्रार्थना के पीछे हृदय में लालित्य बनाए रखने के लिए है। हृदय पाषाणवत न हो । लालित्य मेघराग और वसन्तराग की पत्नी को भी कहते हैं । अतः हृदय वर्षा ऋतु और वसन्त ऋतु की मोहकता और सौम्यता के मौसम जैसा रहे ।


उदर की रक्षा शूलधारिणी देवी से करने का आशय भी मेडिकल साइंस के ज्ञान की ओर इंगित करता है।  शूल अस्त्र के नुकीले भाग को कहते हैं । वायु-विकार में यही चुभन होती है। यही चुभन पेट, हृदय, पसली और पेड़ू में कष्ट को जन्म देती है।  वायु-विकार (गैस्टिक ट्रबुल) केवल अखाद्य वस्तु के खाने से ही नहीं बल्कि अधिक शोक और नकारात्मक जीवन जीने से, दूसरों को मजाक बनाकर हंसने से, अधिक सेक्स से तथा अधिक व्रत-उपवास से भी होता है।  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की यही दृष्टि है । इतना ज्ञान आज भी पूरे विश्व में मेडिकल डॉक्टरों को नहीं है।


इसी प्रकार कवच में जिस-जिस  देवी से जिस-जिस अंग की रक्षा की प्रार्थना की गई है, उसमें अध्यात्म के जरिए चिकित्सा-विज्ञान का भाव अंतर्निहित है।


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