" दो बूंदे "


✍️ अंजू जांगिड (पाली, राजस्थान)


जो बूंदे गिरी आसमाँ से खुद
को सम्भालने में जिंदगी बीती...!!


मेरे साथी तेरे साथ के लिये
अक्सर तरस हूँ जाती...!!


जब बरसती बरखा है तेरे
स्पर्श की याद भीगो जाती...!!


तुम सँग जो पल जिए थे
तुम्हे ढूंढने में रात है बीती...!!


बूंदे मेरे रुखसार को छूती
दबी से मुस्कान छा है जाती...!!


तुम ख्वाब सजाते हो मेरे
उन लम्हो को में जागते जीती...!!


नम आँखों की कोर वह
नमकीन सी बह जाती...!!


Comments