डिजिटल प्लेटफार्म से बेपटरी हुई न्याय व्यवस्था


रिपोर्ट : एडवोकेट विनीत दूबे


देशव्यापी लॉकडाउन ने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया है। पूरा देश इस संकट से कराह रहा है। न्याय का मंदिर कहे जाने वाले न्यायालय भी इस संकट के प्रभाव से अछूते नहीं हैं। लॉकडाउन के कारण उच्च न्यायालय ने न्याय- व्यवस्था को सुचारू ढंग से चलाने के लिए कई नए नियम बनाए। जिससे याचियों को बिना किसी समस्या के न्याय मिल सके। उच्च न्यायालय ने सरकार द्वारा निर्देशित नियमों का पालन करते हुए वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अतिआवश्यक मामलों की सुनवाई का आदेश दिया। लेकिन हाल ही में बार काउंसिल ऑफ इण्डिया (बीसीआई) की रिपोर्ट के मुताबिक 'लॉकडाउन का कुछ लोग अनुचित लाभ उठा रहे हैं।


उच्चस्तरीय कनेक्शन रखने वाले 'विशेष' लोगों द्वारा पूरी न्याय-प्रणाली का अपनी सुविधानुसार प्रयोग किया जा रहा है। पूरी न्याय-प्रणाली सामान्य अधिवक्ताओं के हांथ से लगभग निकलती जा रही है। ' बीसीआई ने अपनी रिपोर्ट में साफ शब्दों में यह बताया है कि 'डिजिटल प्लेटफॉर्म न्याय-प्रक्रिया में सहायक सिद्ध नहीं हो पा रहा है। वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग में कभी भी पारदर्शिता पर यकीन नहीं किया जा सकता, जबकि खुली अदालत की सुनवाई में न्याय को खुली अदालत में वितरित किया जाता है। न केवल संबंधित पक्षों और उनके वकीलों की उपस्थिति में चर्चा/तर्क दिए जाते हैं बल्कि अन्य अधिवक्ताओं, मीडिया, जितने भी लोग मौजूद हैं। सभी के सामने सारी बातें होती है।'


इसके अलावा कई अधिवक्ता कमजोर पृष्ठभूमि से हैं। जिनके पास समुचित संसाधनों तथा उन्नत तकनीक के अनुरूप शिक्षा नहीं है। ऐसे में न्याय-प्रणाली का डिजिटलाइजेशन कई अधिवक्ताओं की आजीविका को बाधित कर रहा है। न्याय-व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है, जो व्यापक स्तर पर समाज को प्रभावित करती है। लॉकडाउन के प्रथम चरण में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना था कि मात्र 20-21 दिन की बंदी से न्यायालय छह से आठ महीने तक पिछड़ जाएंगे। पहले ही हजारों की तादात में मुकदमे अनिर्णित हैं। ऐसे में इतने दिनों तक कोर्ट बंद रहने से लंबित मामलों की संख्या और बढ़ जाएगी। अतः न्याय-प्रणाली को डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए गतिमान रखना चाहिए। लेकिन न्यायिक कामकाज के डिजिटलाइजेशन के बाद काम के कठिन और असाध्य होने की बातें सामने आने लगीं।


इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद फरमान अहमद नकवी इस संबंध में बताते हैं कि किसी भी स्तर पर तकनीक को शामिल करने के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। अदालतों में वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग और ई-फाइलिंग के जरिए मुकदमा दाखिल करने तथा सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं और वादकारियों को पेश आने वाली समस्याओं का कारण इस तकनीक का गलत ढंग से लागू होना है। श्री नकवी का कहना है कि मुख्य समस्या संचालन-प्रणाली की है। यानी जो लोग न्यायालयों में तकनीकी रूप से कामकाज देख रहे हैं या करवा रहे हैं। वे स्वयं ही तकनीकी ज्ञान में पिछड़े हुए हैं। संपूर्ण तकनीकी संचालन प्रणाली ऐसे क्लर्कों और मुंशियों के हांथ में है, जो स्वयं ही इस प्रकार की तकनीक से अनभिज्ञ हैं। अतः वे अधिवक्ताओं और वादकारियों की मदद कैसे कर सकते हैं ? किसी कार्य की सफलता कार्यकर्ताओं की दक्षता पर निर्भर करती है। तकनीकी स्तर पर न्यायिक कार्यो के संचालन हेतु यदि आईटी क्षेत्र के किसी विशेषज्ञ की सहायता ली जाती तो शायद यह प्रयोग सफल होता। प्राय: आयु के अनुसार लोगों के तकनीकी ज्ञान में अंतर होता है। देशभर के 90% अधिवक्ता और न्यायाधीश खुद तकनीक की बारीकियों से अनजान हैं। शायद उन्हें उचित प्रशिक्षण द्वारा इस कार्य में कुशल बनाया जा सकता है लेकिन उसके लिए पर्याप्त समय की आवश्यकता है।तकनीक के अनुरूप बनने के लिए उसकी बारीकियों को समझना जरूरी है।


इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता गौरव सिंह ई- फाइलिंग के द्वारा मुकदमा दाखिल करने में आ रही परेशानियों को साझा करते हुए बताते हैं कि सबसे पहले अर्जेंसी एप्लीकेशन ऑनलाइन देनी होती है। जिसके आधार पर कोर्ट मुकदमे की सुनवाई तय करता है लेकिन अपूर्ण या अधूरी जानकारी के आधार पर एप्लीकेशन रद्द कर दी जाती है और कोर्ट की तरफ से जारी होने वाला यूनिक कोड नहीं मिलता, जिससे मुकदमा दाखिल नहीं हो पाता। एप्लीकेशन निरस्त करने के कारण में केवल 'अपूर्ण' लिख दिया जाता है, जिससे दस्तावेजों में 'कौन सी जानकारी अपूर्ण है'-यह समझ नहीं आता है क्योंकि 'अपूर्ण' शब्द अपने आप में बहुत व्यापक अर्थ रखता है। इसके अलावा कभी-कभी किसी तकनीकी खराबी या अवरोध के कारण अर्जेंसी एप्लीकेशन दाखिल नहीं हो पाती तो ऐसी सूरत में न्यायालय अधिवक्ता या वादकारी से अर्जेंसी एप्लीकेशन पुनः डालने को कहता है। जिसमें अधिवक्ता और वादकारी दोनों का समय तथा परिश्रम बर्बाद होता है। इसके साथ ही दस्तावेजों की स्कैनिंग, डिजिटल सिग्नेचर, ई-कोर्ट शुल्क आदि कई ऐसी तकनीकी दिक्कतें हैं। जिन्हें पार करके ई- फाइलिंग की प्रक्रिया को पूरा करना एक सामान्य और तकनीकी रूप से अल्पज्ञ अधिवक्ता के लिए दुसाध्य कार्य है।


न्यायालय के अधिवक्ताओं द्वारा डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कार्य करने में असुविधा जताने पर बीसीआई ने भारत के मुख्य न्यायाधीश  (सीजेआई) को पत्र द्वारा पूरे मामले की सच्चाई बताते हुए लिखा- 'इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता है कि ओपन कोर्ट रूम प्रैक्टिस के अपने मूल्य और महत्व हैं। यह पारदर्शिता से भरा है और इसका परिणाम सच्चा न्याय है।वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से तर्क कभी भी खुले कोर्ट रूम के न्यायिक कार्यों के विकल्प नहीं हो सकते है।' साथ ही बीसीआई ने यह भी संकेत किया कि 'ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग शायद जमीनी हकीकत भूल गए हैं, इसीलिए इस तरह की व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं।वह शायद संसाधनों और तकनीक को भूल गए हैं, जो यहां व्यापक स्पेक्ट्रम पर उपलब्ध नहीं है।'


हालांकि भारत विशाल और समर्थ देश है। लेकिन यहां के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध तकनीकी संसाधनों और प्रशिक्षण में व्यापक अंतर है। नि:संदेह न्यायिक व्यवस्था को तकनीक के माध्यम से गतिमान रखने का प्रयोग सराहनीय हैं। लेकिन प्रयोगों की आधारशिला व्यवस्थित कार्यप्रणाली होती है। व्यवस्था और पूर्वयोजना के अभाव में प्रयोग सफल नहीं हो पाते हैं। अत: डिजिटल पटरी पर न्याय के पहियों को दौड़ाने के लिए अभी थोड़ी और दक्षता एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता है।


 


 


Comments