बोझ सीने में दबाकर, सब अकेले सह गए !


इक अपुर्ण क्षति…, विधा - गीतिका छन्द


✍️  रीना गोयल (सरस्वती नगर, हरियाणा)


बोझ सीने में दबाकर,सब अकेले सह गए।
कुछ कभी कहते किसी से, खुद सिसकते रह गए।।
हाथ जीवन से छुड़ाया, मृत्यु को अपना लिया।
हैं सभी हैरान तुमने, ये अचानक क्या किया।।


आस का हर बंध तोड़ा, डोर जीवन तोड़कर।
जिंदगी सस्ती नहीं थी, जो गए हो छोड़कर।।
मुश्किलें हैं अंग जीवन का नहीं कोई सजा।
जो करे संघर्ष जीवन में वही पाये मजा।।


हा ! सुनहरे भविष का, क्या रह गया है अर्थ अब।
बंद दरवाजे हुए अरु, हो गया है व्यर्थ सब।।
इक कहानी बन गयी है, इक कहानी को मिटा।
छल चली है मृत्यु श्वासें, है कहीं कोई लुटा।।


घूंट पीकर खून के गल, फंद वह बुनता रहा।
मृत्यु से पर पूर्व सौ -सौ, बार वो मरता रहा।।
जिंदगी बन रेत हाथों, से फिसलती है जहां।
आत्महत्या की यकीनन, ख्वाहिशें पलती वहां।।


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