योगी ने बढ़ाया प्रियंका का कद


रिपोर्ट : मुन्ना त्रिपाठी


लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की सुप्त पड़ी राजनीति तालाबंदी के दौरान नींद से जागी और प्रवासी मजदूरों के बहाने जमकर परवान चढ़ी। सड़कों पर पैदल चल रहे मजदूरों को उनके गृह जिले/नगर/गाँव तक पहुँचाने के लिए कांग्रेस महासचिव ने बसें चलाने की अनुमति क्या मांगी, उत्तर प्रदेश का शासन-प्रशासन जितनी बेशर्मी कर सकता था, की। इससे दो दिन पहले ही कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की मजदूरों से दिल्ली की सड़कों पर बातचीत को नौटंकी बता चुकीं वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण मजदूरों के मुद्दे पर भाजपा की सोच का प्रदर्शन कर चुकी थीं।


उत्तर प्रदेश  की राजनीति में कमजोर पड़ चुकी कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी ने मजदूरों के मामले पर हमलावर होकर चतुराई से इस मामले पर समाजवादी पार्टी  और बहुजन समाज पार्टी को पीछे छोड़ा तो प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा को भी घेरा। राज्य में कमजोर विपक्ष का फायदा उठाकर कांग्रेस ने बस पर सवार होकर 2022 की चुनावी दौड़ में साइकिल और हाथी को पीछे छोड़ दिया है। जिस तरह से उत्तर प्रदेश सरकार ने कांग्रेस प्रायोजित बसों को राज्य में न चलने देने की कोशिश की उससे कांग्रेस को नुकसान की बजाय फायदा ही हुआ है। योगी के सलाहकार जिस अफरा-तफरी में इस मुद्दे को निपटाने में जुटे थे, उससे भाजपा की वाहवाही से ज्यादा भद्द पिटी है। हाँ कांग्रेस की बसें वापस होने के बाद अगर योगी ने इन मजदूरों को प्रदेश परिवहन सेवा दी होती तो बात अलग होती। इस मुद्दे पर कौन सही है या कौन गलत की समीक्षा के बीच एक बात तो साफ उभरकर आई है कि कांग्रेस ने 1000 बसें चलाने का दावा कर मजदूरों के मन में कहीं ना कहीं जगह बनाई और उसका यह अभियान कारगर रहा।


भले भाजपा के साइबर योद्धा बसों के नंबरों को स्कूटर, ऑटो, जीप वगैरह के नंबर बताकर सोशल मीडिया पर ऊधम मचाते रहे लेकिन जो सन्देश गया वह भाजपा के खिलाफ था। जैसा कि उम्मीद थी, तनखैया चैनल और पट्टाधारी समाचार माध्यमों ने पूरी कोशिश की कि बसों के नंबरों के मुद्दे पर कांग्रेस को गुनाहगार साबित कर दें, मगर यह भी सफल न हुआ। कल्पना करें जब योगी की बसें छात्रों को लेने कोटा गई थीं तब यही अडचनें अगर राजस्थान सरकार ने डाली होती तो क्या होता? चैनल छाती पीट-पीटकर कांग्रेस सहित गहलोत सरकार को कोस रहे होते। मगर क्या मजाल कि उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल करते कि आखिर मजदूरों को अगर कांग्रेस अपनी बसों से ढो रही है तो ऐतराज क्या है? ध्यान रहे कि प्रियंका ने लोकसभा चुनाव के दौरान भी कहा था कि वे उप्र नहीं छोड़ेंगी। जब सोनभद्र में गरीबों पर अत्याचार हुआ, तब प्रियंका अपनी टीम के साथ वहां गरीबों के बीच खड़ी नजर आईं। उन्नाव रेप कांड में भी प्रियंका काफी मुखर होकर सरकार को घेर रही थीं। कांग्रेस की महासचिव और पूर्वांचल प्रभारी प्रियंका गांधी पहली तालाबंदी से ही सक्रिय हैं और 25 मार्च को प्रदेश के अपने कार्यकर्ताओं से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर राज्य में खाने का इंतजाम करने को कहा। उसी दिन उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर मजदूरों, किसानों और गरीब लोगों के लिए कई सुझाव दिए गए थे। पत्र में यह भी कहा गया था कि कांग्रेस जरूरत पड़ने पर अपने कार्यकर्ताओं को बतौर वॉलंटियर लगाने को तैयार है।


पार्टी ने लखनऊ और अन्य जगहों पर नेहरु रसोई शुरू कर सीधे जनता तक पहुँचने का काम शुरू किया  और प्रियंका गांधी लगातार इसकी निगरानी कर रही हैं। कई पूर्व छात्र नेता, जो प्रियंका गांधी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, वे कहते हैं, ‘हम और हमारे नेता मजदूरों और गरीबों को लेकर शुरू से चिंतित थे। हम सरकार के दावों और असलियत के बीच भारी अंतर को भी देख-समझ रहे थे। एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर यह सामान्य बात है कि हम लोगों के लिए काम कर रहे हैं। अगर इससे हमारी पार्टी का विस्तार होता है तो यह अच्छा है।’ ताजा घटनाक्रम में भी प्रियंका ने गरीबों का साथ देने का सन्देश दिया है जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के साथ लगातार पत्राचार कर जता दिया है कि वे मजदूरों के हित में काम करना चाहती हैं। राजनीति की आड़ में प्रशासनिक अड़ंगेबाजी कर भाजपा और योगी ने प्रियंका को और ज्यादा सुर्ख़ियों में ला दिया है। इसमें कांग्रेस और प्रियंका का कोई नुकसान नहीं हुआ है। अगर भाजपा यह सोचती है कि बसें न चलने देकर उसने कूटनीतिक जीत हासिल की है, तो यह उसके लिए एक बुरा स्वप्न साबित होगी।


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