फिजिकल डिस्टेंसिंग के दौर में भी राष्ट्रहित के लिए मनसा-सामजंस्य जरूरी



  • हिंदी जगत को अधुनातन दृष्टि देने वाले डॉ भवदेव पाण्डेय ने की  97वीं जयंती मनाई गई


रिपोर्ट : सलिल पांडेय


मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश : हिंदी साहित्य में नवजागरण आंदोलन के अंकुरण की भूमि मिर्जापुर रहा है । इस आंदोलन के महानायक भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र इस दिशा में कठिन तप और साधना काशी में बाबा विश्वनाथ की नगरी से कर रहे थे परन्तु अभियान के यज्ञ की अग्नि 1874 में प्रज्ज्वलित होने लगी जब उनकी मुलाक़ात माँ विंध्यवासिनी की नगरी के तिवराने टोला मुहल्ले में रहने वाले चौधरी बदरीनारायण उपाध्याय 'प्रेमघन' से हुई । 1856 में एक जमींदार परिवार में जन्मे प्रेमघन जी काशी के रईस परिवार में जन्मे भारतेंदु बाबू के आमन्त्रण पर बुढ़वा मंगल कार्यक्रम देखने गए तो इस कार्यक्रम के साथ  भारतेंदुजी भी उनके अनन्य हो गए । इसके बाद साहित्य का पुल मिर्जापुर-बनारस के बीच बनने लगा और प्रेमघनजी कजली उत्सव पर भारतेंदु बाबू को बुलाना नहीं भूलते थे । फिर तो भारतेंदु मण्डल की जो परिधि बनी उसमें मिर्जापुर के आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, बंगमहिला, वामनाचार्य गिरि तो जुड़े ही ।साथ ही प्रेमघनजी की कोठी में सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' महादेवप्रसाद सेठ 'मतवाला', पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' आदि का साहित्यिक जमावड़ा निरन्तर होता रहा । जिसमें साहित्य की समृद्धि से लेकर राजनीति एवं ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अभियान की रणनीति बनती थी ।



इसी मुहल्ले में साहित्य को आधुनातन दृष्टि देने वाले राष्ट्रीय समालोचक डॉ भवदेव पांडेय ने साहित्य के दर्पण पर जमी धूल को साफ़ करने का अभियान ही नहीं चलाया बल्कि 20वीं सदी के अंत में साहित्य क्षेत्र में चल रहे दलित और नारी-विमर्श आंदोलन का जनक मिर्जापुर को ही साक्ष्यों एवं ठोस प्रमाणों के साथ सिद्ध किया, तब उन तमाम साहित्य-मनीषियों के पुनर्मूल्यांकन का दौर शुरू हुआ जिससे साहित्यजगत अनभिज्ञ था । इसमें निराला, उग्र, बंगमहिला आदि का नाम शामिल है । यही कारण था कि 'हंस' साहित्यिक पत्रिका ने डॉ पाण्डेय को दबंग समीक्षक तो नया 'ज्ञानोदय' पत्रिका ने लिखा कि निराला की साहित्य साधना में अनेक पक्ष छूट गए थे जिसे डॉ पाण्डेय ने उद्घाटित किया । प्रेमघनजी द्वारा महिमामण्डित इस जिले को  डेढ़ शताब्दी बाद डॉ पाण्डेय ने साहित्य के शीर्ष पर पहुंचाया । डॉ पाण्डेय के इस योगदान एवं 2 दर्जन समीक्षा-पुस्तकों के लेखन पर उन्हें हिंदी-गौरव, साहित्य-भूषण, अज्ञेय सम्मान से नवाजा गया । साथ ही साहित्य अकादमी, उ0प्र0 संस्कृति अनुभाग द्वारा उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित की गयीं । बुद्ध पूर्णिमा वर्ष '1924 में अवतरण लेने वाले डॉ पाण्डेय टालस्टाय की कविता की दृष्टि एवं आत्मकथा लिखते हुए साहित्य की पीढ़ी को निरन्तर नए पन की तलाश जारी रखने का सन्देश दिया । डॉ पांडेय ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध तक साहित्य की राजधानी रहे मिर्जापुर की गरिमा को पुन:प्रतिष्ठापित किया एवं यहां साहित्य साधना करने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल,  सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', बाबू महादेव प्रसाद सेठ 'मतवाला, पांडेय वेचन शर्मा उग्र, चौधरी बदरीनारायण प्रेमघन, वामनाचार्य गिरि, प्रथम महिला हिन्दी कहानी लेखिका राजेन्द्र बाला घोष 'बंग महिला' सहित मिर्जापुर के लोकसाहित्य के वैदिक कॉल से मिली महत्ता को नए स्वरूप में परिभाषित किया।  इसके अलावा हिंन्दी साहित्य का इतिहास, स्वदेश के फिराक, भारतेंदु बाबू हरिश्चन्द्र नए परिदृश्य, स्वदेश के फिराक, अंधरे नगरी आदि पुस्तकों को शोध प्रबंध के रूप में प्रस्तुत किया ।



बुद्ध पूर्णिमा की तिथि पर नगर के तिवराने टोला स्थित संस्थान में डॉ पांडेय की 96वी जयंती पर हुई विचार गोष्ठी में अनेक वक्ताओं ने विचार व्यक्त किए । फिजिकल डिस्टेंसिंग के दौर में मनसा-लगाव बनाए रखने पर जोर दिया गया ताकि राष्ट्रहित के मुद्दे पर सभी के विचार एकजुट रहे । कार्यक्रम का संयोजन सलिल पांडेय ने किया ।


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