मां की ममता के मंझे से जो कटा वह गिरा भी और लूटा भी गया


रिपोर्ट : सलिल पांडेय


मां के रहते किसी देवी-देवता की पूजा अनिवार्य नहीं


भारतीय धर्मग्रन्थों ने मां की महत्ता पर उक्त व्यवस्था दी है।


मातृदेवो भव (तैत्तिरीय0 1/11) इष्टदेव समझकर माता की सेवा करें।


मातृतोSन्यो न देवोSस्ति तस्मात्पूज्या सदा सुतै:।


माता के विरुद्ध आचरण संतान को किसी भी दशा में नहीं करना चाहिए। मां को किसी भी प्रकार की पीड़ा संतान के जीवन को कंटकाकीर्ण बनाता है।


सारे शुभ अनुष्ठानों में सारे देवी देवताओं के साथ ग्राम देवता, वास्तुदेवता आदि की पूजा के उच्च शिखर पर पहुंचकर मातृ-पितृ चरणकमलेभ्यो नम: मन्त्रवाक्य जपने के बाद ही अनुष्ठान की अग्रिम प्रक्रिया शुरू होती हैं।


त्वमेव माता च पिता त्वमेव... प्रार्थना में भगवान को सबसे पहले माता के रूप में याद किया जाता है।
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सामाजिक एवं व्यवहारिक पक्ष


'कितनी भी हीन दशा क्यों न हो, भारत में बड़े से बड़े लोग नारी को माता का ही संबोधन देते हैं- फादर अबे ड्यूबो


मायावी दुनियां के अनन्त आकाश में उड़ने और छलांग लगाने के लिए मां की ममता का मंझा (पतंग की डोरी) सर्वाधिक उपयोगी होता है। कटा तो गिरा भी और लूटा भी गया।


वर्तमान दौर में विवाहिता स्त्रियां सास-श्वसुर को माता-पिता मानकर सेवा करती हैं तो उन पर खुशियों की अमृत-वर्षा होती है वरना पुण्य नष्ट होते हैं। जीवन का आह्लाद दूर होता है।


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