लॉकडाउन : प्राकृतिक निर्मलता का स्वर्णयुग


रिपोर्ट : एडवोकेट विनीत दुबे


औद्योगिक क्रांति के बाद आर्थिक विकास दर को बढ़ाने की गणित में उलझे विकसित देशों ने गत वर्षों में पर्यावरण का जो हाल किया है। वह चार दशकों से वैश्विक मंच पर चिंता का विषय बना हुआ है। विकसित देशों का अनुकरण करते हुए भारत ने आर्थिक विकास सूचकांक वृद्धि को ही राष्ट्रीय समृद्धि का स्रोत मानकर अपनी सभी प्राचीन अवधारणाओं का ह्रास कर डाला। कुछ समय में ही प्राकृतिक आपदाओं, प्रदूषण से होने वाली बीमारियों, पर्यावरण असंतुलन ने पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी संतुलन की आवश्यकता को अनेक वैश्विक एवं राष्ट्रीय मंच पर बहस का विषय बना दिया। जब हालात बद से बदतर हो गए, तब विश्व के कई देशों ने पर्यावरण-संरक्षण को अपनी विकास योजनाओं में शामिल करना शुरू किया, परन्तु बड़ी-बड़ी योजनाओं और रणनीतियाें से भी पर्यावरण संतुलन कायम न किया जा सका, लेकिन दो महीनों से चल रहे लॉकडाउन ने संपूर्ण पर्यावरणीय परिदृश्य बदल कर रख दिया। जिस गंगधार को बीते 5 सालों में हजारों करोड़ रुपए खर्च करके भी निर्मल न बनाया जा सका, उसे मात्र 21 दिनों के लॉक डाउन ने ही निर्मल और पवित्र बना दिया।



(विशाल सिंह : काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के मुख्य कार्यपालक अधिकारी)


काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के मुख्य कार्यपालक अधिकारी विशाल सिंह बताते हैं कि निस्संदेह लॉक डाउन का गंगा निर्मलीकरण पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। एक लंबे समय से 'नमामि गंगे परियोजना' के माध्यम से सरकार गंगा निर्मलीकरण के प्रयास कर रही है। जिसके तहत कई नालों को, मूर्ति- विसर्जन तथा फूल-माला आदि कचरे को गंगा में प्रतिबंधित किया गया, फिर भी गंगा जल निर्मल ना हो सका। लेकिन लॉकडाउन ने गंगा की धारा को फिर से शुद्ध, निर्मल और पवित्र बना दिया। श्री सिंह का मानना है कि यदि सरकार एक-दो वर्षों के अंतराल पर कुछ दिनों  के लॉकडाउन की व्यवस्था करे, तो हमारी प्रकृति, जल, नदियां फिर से जी उठेंगी। 


यह सत्य है कि विकास की राह पर दौड़ते हुए हमने प्रकृति का ना सिर्फ निर्मम दोहन किया बल्कि उसे बेतरह कुचला भी है। जिसका परिणाम जहरीली, दमघोंटती हवा, आग उगलती धरती और रोगजनित जल के रूप में हमारे सामने है।



(डॉक्टर बृजेशकांत द्विवेदी : निदेशक एवं पर्यावरणविद् बायोवेद रिसर्च इन्स्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर टेक्नॉलॉजी एण्ड साइंस, प्रयागराज)


बायोवेद रिसर्च इन्स्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर टेक्नॉलॉजी एण्ड साइंस, प्रयागराज के निदेशक एवं पर्यावरणविद् डॉक्टर बृजेशकांत द्विवेदी बताते हैं कि भले ही लॉकडाउन अर्थव्यवस्था के गणित को बिगाड़ रहा हो, लेकिन हमारी प्रकृति के लिए यह समय बहुत ही सकारात्मक बदलाव का है। प्रकृति ने हमें गंगा के रूप में  ऐसा बहुमूल्य उपहार दिया था, जिसका यदि हमने सम्मान किया होता तो कदाचित वर्तमान जैसी स्थिति उत्पन्न ना होती। गंगा के जल में प्राकृतिक रूप से 'निंजा वायरस' नामक शक्तिशाली वायरस पाया जाता है। यह डायरिया, टीबी, मेनिन्जाइटिस, पेचिश, टाइफाइड आदि अनेक जानलेवा रोगों के  कीटाणुओं को जल में नष्ट कर देता है। गंगाजल में लगभग 17 प्रकार के ऐसे वायरस मिलते हैं, जो बीस से अधिक प्रकार की बीमारियों को खत्म कर सकते हैं। औद्योगिक अपशिष्ट और नगरीय कचरे के कारण गंगा की यह जीवनदायिनी धारा मलिन और जानलेवा होती जा रही थी। लेकिन गत दो महीनों से चल रहे लॉकडाउन ने गंगा और यमुना के प्रदूषित और काले जल को फिर से निर्मल कर दिया है। गंगा के जिस जल से दुर्गंध आने लगी थी। अब वह फिर से पीने योग्य हो गया है। यमुना के जल की नीली आभा, जो काली पड़ चुकी थी, एक बार फिर से नीली दिखने लगी है। जल की शुद्धता का माप उसमें उपस्थित ऑक्सीजन की मात्रा होती है। इन दिनों गंगा नदी में बढ़ती मछलियों की तादाद यह स्पष्ट करती है कि गंगाजल में एक बार फिर से ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ गई है, जो जलीय जीवों के लिए अच्छा संकेत है।


प्रयागराज के संगम तट पर रोजाना स्नान करने वाले साधु राघवानंद का कहना है कि आज तक संगम तट पर गंगा-यमुना-सरस्वती की ऐसी निर्मल धारा देखने को नहीं मिली। जल की निर्मलता के कारण अब तो तट के पत्थर भी दिखने लगे हैं। यह नजारा सचमुच मन को प्रसन्न कर देता है और हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमने किस कदर प्राकृतिक अवयवों का न सिर्फ शोषण किया बल्कि उसे जहरीला बना दिया था।


भारतीय जीवन शैली सनातनी परंपरा और पारिस्थितिकी मित्र के रूप में विकसित हुई थी। जिसके कारण हम प्रकृति के प्रत्येक अवयव जैसे वायु, प्रकाश और ऊर्जा के स्रोत सूर्य-चंद्रमा, जल, पेड़-पौधे, पहाड़ और वनस्पतियों आदि सभी को पूजनीय मानते थे। हम प्रकृति के रक्षक भी थे और उपभोक्ता भी। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में हम अपनी संस्कृति को भूलकर प्रकृति विरोधी क्रियाएं करने लगे। जिसका परिणाम पृथ्वी के बढ़ते तापमान प्रदूषण और महामारियों के रूप में हमारे सामने हैं।



(डॉ0 सतीश सिंह : भूगोल विभाग, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी)


पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र पर लॉकडाउन के सकारात्मक प्रभाव को स्पष्ट करते हुए भूगोल विभाग, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के डॉ0 सतीश सिंह बताते हैं कि प्रकृति में स्वाभाविक रूप से पुनर्निर्माण की क्षमता होती है, जो तथाकथित मानवीय विकास के कारण बाधित हो गई थी। लेकिन कोरोना काल में विश्व के करोड़ों छोटे-बड़े उद्योग, वाहन और विमान सेवाएं बंद होने के कारण यह क्षमता पुनर्विकसित हो गई। हजारों, लाखों वाहनों के माध्यम से कार्बन-डाइ-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन जैसी जहरीली गैसें वायुमंडल में घुल जाती थी और वहां से वर्षाजल के द्वारा मिट्टी, नदियों और वनस्पतियों में मिलती थीं। इस कारण सभी प्राकृतिक अवयव प्रदूषित हो गए। अब लॉकडाउन के कारण जब वाहनों का आवागमन बंद हो गया, तब जहरीली गैसों का उत्सर्जन भी बंद हो गया। जिससे हवा, पानी और वातावरण फिर से शुद्ध लग रहा है। वायु गुणवत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हवाई दृश्यता यानी एयर विजिबिलिटी इतनी बढ़ गई है कि सहारनपुर से यमुनोत्री की चोटियां दिखने लगी हैं। पिछले कुछ वर्षों से ग्रीन हाउस गैसों के कारण लगातार तापमान वृद्धि, ओजोन परत में छेद आदि समस्याएं सुनने में आ रही थी। यदि हम प्रयागराज के तापमान की बात करें, तो यह शहर अप्रैल माह से ही जलने लगता था, लेकिन इस बार मई माह में भी वैसी गर्मी महसूस नहीं हो रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि लॉकडाउन से प्रदूषण नियंत्रित हुआ है। जब वायुमंडल प्रदूषणमुक्त होगा, तो वर्षा अच्छी होगी। जिससे फसलों और वनस्पतियों की बढ़त भी अच्छी होगी। एक तरह से कहा जा सकता है कि लॉकडाउन मानवीय समाज के लिए भले ही एक कठिन दौर हो, लेकिन प्रकृति का यह स्वर्णिम समय है।


यह संभव है कि भविष्य में भी मानव-जाति के  लिए ऐसे जैविक संकट उत्पन्न हो सकते हैं। जिनसे बचाव तो दूर, हमें उसके स्वरूप और मारक- क्षमता के विषय में भी ठीक-ठीक जानकारी ना हो। वैज्ञानिकों के अनुसार भारतीय जलवायु में प्राकृतिक रूप से ऐसे औषधीय गुण मौजूद हैं, जो खतरनाक से खतरनाक वायरस को नष्ट करने की क्षमता रखते हैं। बस हमें इसे समझने, संरक्षित और संवर्धित करने की जरूरत है।


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