क्या मज़दूर के बिना मालिक का काम चलेगा?


रिपोर्ट :  मुन्ना त्रिपाठी


वर्ण व्यवस्था के खांचे से भी देखें, तो मज़दूर शुद्र हैं, यानी पाँव. कोई मूर्ख ही होगा, जो पाँव पर कुल्हाड़ी चलाएगा. लेकिन कोरोना संकट में मज़दूरों को पाँव भी नहीं पाँव की धूल समझा गया. 


संपन्न लोगों की तो बात ही छोड़िये, दो चार महीने के लिए भी खाने- पीने और थोड़ी सी सुविधाएं जमा कर लेनेवाले समाज ने लॉक डाउन में धूल झाड़कर बेड पर आराम करना बेहतर समझा. 


मजदूरों की सुध लेने वाला न उनका मालिक रहा न सरकार. काम नहीं तो वेतन नहीं. सरकार अपने कर्मचारियों को वेतन दे रही है, लेकिन इन मजदूरों को वेतन देने के लिए शायद ही कोई मालिक तैयार है.


ऐसे में मजदूर यहाँ कैसे और किसके भरोसे बैठा रहे? लॉक डाउन कब टूटेगा, पता नहीं. आसार लंबा खिंचने के हैं, क्योंकि कोरोना और तेज़ी से पसरता जा रहा है. अभी जो मालिक, ठेकेदार सेलरी नहीं दे रहा, सिर्फ खाना पानी दे रहा है, कल खाना पानी भी देगा या नहीं, कैसे भरोसा हो? तो भरोसे के संकट की वजह से मजदूर समय रहते अपने घर पहुँच जाना चाहता है. इसीलिये वह अकेले या पूरे परिवार को लेकर पैदल ही सही गाँव चले जाना चाहता है. 


कोरोना की कोई दवा नहीं है, कोई निश्चित इलाज नहीं है. कोरोना पीड़ितों के साथ काम करने वाले डॉक्टरों को सुरक्षा के उपकरण नहीं दिए जा रहे हैं, और खुद डॉक्टर कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं, मर रहे हैं, तो बेचारे मजदूरों की क्या बिसात?  मज़दूरों और उनके परिवार वालों के बीच घुस रहा ये भय मज़दूरों के पलायन की सबसे बड़ी वजह है. 


और तीसरी जो सबसे मज़बूत वजह है वो ये अनाज के मामले में सिर्फ देश ही आत्मनिर्भर नहीं है, मजदूर भी आत्मनिर्भर हैं. गाँव में उनके खाने पीने की दिक्कत नहीं है. बिहार और पूर्वांचल की बात तो पूरे भरोसे और दावे के साथ कह सकता हूँ, वो शहर इसलिए नहीं आते कि गाँव में वे भूखों मर रहे हैं, शहर इसलिए आते हैं कि उनके मन में भी सपने हैं, वे अपने पिता की जवाबदेहियों में हाथ बंटाना चाहते हैं, अपनी बहनों को ठीक ठाक दहेज़ देकर अच्छे घर में ब्याहना चाहते हैं. वे चाहते हैं उनके बच्चे ठीक ठाक स्कूलों में पढ़ें और इस लायक बने कि सड़कों पर भटकना न पड़े. और ये मजदूर बनकर शहर आने वाले लोग सिर्फ मुस्लिम या दलित नहीं है , पिछड़ी जातियाँ और सवर्ण भी इनमें शामिल हैं. मिश्रा जी, दुबे जी, सिंह साहब भी हैं, जो वाचमैनी से लेकर सेंटिंग और कारपेंटर का काम कर रहे हैं. 


इसलिए अगर मंत्रियों और शहरियों को लग रहा है कि मजदूर भागकर जाएंगे कहाँ, दो महीने बाद भूखों मरने की नौबत आयेगी तो फिर शहर आयेंगे, काम के लिए गिड़गिड़ाएंगे तो मुगालते में हैं. जिन लघु और कुटीर उद्योंगों के काँधे देश की अर्थव्यवस्था की पालकी ढुलवाना चाहती है सरकार, वो धड़ाम हो सकती है. और जो राज्य सरकारें स्थानिकों के भरोसे उद्योग धंधों और व्यवसायों को चलाना चाहती है उनकी भी बुद्धि घुटनों में ही रहने वाली है. 


तो इस बार मजदूरों की ताकत दिखेगी. मजदूर बिना मालिक का काम चल  सकता है? या कि मालिक के बिना मजदूर का काम चल सकता है है या दोनों एक दूसरे केलिए ज़रूरी हैं?


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