इन बंद कमरों में मेरी सांस घुटी जाती है - खिड़किया खोलता हूं तो जहरीली हवा आती है


हिन्दी पत्रकारिता दिवस की पूर्व संध्या पर शोध-पत्र जारी


चैनलीय पत्रकारिता पर विशेष नज़र


रिपोर्ट : सलिल पांडेय


मिर्जापुर, (उ0प्र0) : दो शताब्दी में मात्र 6 वर्ष पीछे 1826 में ब्रिटिश हुकूमत के लिए आग का गोला बन प्रकट हुए उदन्त मार्तंड अखबार और एक शताब्दी पूर्व दिवंगत हुए अकबर इलाहाबादी के खींचों न कमानों को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो की गर्जना 21वीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण में मशहूर पत्रकार एवं कहानीकार स्व कमलेश्वर की छटपटाहट एवं बेचैनी इन बंद कमरों में मेरी सांस घुटी जाती है, खिलकिड़ियाँ खोलता हूं तो ज़हरीली हवा आती है तक पहुंच गई तो यह पत्रकारिता जगत के लिए समुद्र-मंथन की तरह मंथन-चिंतन का विषय होना ही चाहिए । उसमें भी हिंदी पत्रकारिता के लिए विशेष रूप से क्योंकि वैश्विक-दौर में हिंदी पत्रकारिता चतुर्दिक सवालिया निशानों से घिरती जा रही है ।


मात्र एक शताब्दी में हिंदी पत्रकारिता कहां से कहां चली जा रही- हिंदी पत्रकारिता दिवस पर नगर के प्रेमघनमार्ग स्थित हिंदी गौरव डॉ भवदेव पांडेय शोध संस्थान ने डेढ़ शताब्दी में मिर्जापुर की पत्रकारिता के गौरवशाली पक्ष पर एक विशेष रिपोर्ट तैयार की । जिसमें 1881 में नवजागरण काल में पत्रकारिता के साथ हिंदी भाषा के उत्थान और ब्रिटिश गवर्नमेंट के पतन के लिए किए गए प्रयास को महिमामण्डित किया गया लेकिन इस बात पर चिंता प्रकट की गई कि इतने कम समय में हिंन्दी पत्रकारिता द्रौपदी के चीरहरण की पीड़ा से गुजर रही है । विविध वेशों में धृतराष्ट्र वंशज अट्टहास कर रहे हैं जबकि पत्रकारिता का पांडव-पक्ष आंखों पर पट्टी बांध सुख-सुविधा और सम्मान का रस पी रहा है ।


अन्य क्षेत्र शिखर की ओर- एक शताब्दी में प्रौद्योगिकी का क्षेत्र अंतरिक्ष में छलांग-दर-छलांग लगा रहा है । मेडिकल साइंस शिखर की ओर है, कृषि-उद्योग विकासोन्मुख है लेकिन हिंदी पत्रकारिता अस्ताचल सूरज की गति में पहुंचती दिख रही है ।


हम जिसे भुला न पाएंगे- शोध पत्र में मिर्जापुर और आसपास के जिले यथा प्रयागराज और वाराणसी को केंद्र में रखकर विगत एक शताब्दी की पत्रकारिता के मनीषियों को याद किया गया । 1915 में बाबू महादेव प्रसाद सेठ पैतृक पत्थर व्यवसाय को छोड़ कर इलाहाबाद जब गए और मतवाला नाम से अखबार निकालने की योजना बनाई तब वहां राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन ने प्रकाशन का काम कोलकाता से करने की प्रेरणा दी । पश्चिम बंगाल ब्रिटिश यातना की भट्ठी में झुलस रहा था । सेठ जी ने 1923 से मतवाला वहीं से प्रकाशित किया लेकिन 1927 में वे मिर्जापुर आ गए और प्रकाशन यहीं से होने लगा । कलकत्ता से ही जुड़ गए पं सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की सम्पादकीय अग्रलेख ब्रिटिश हुक़ूमत की मौत के परवाने जैसे होते थे लिहाजा बतौर सम्पादक सेठ जी दो बार जेल गए । उसी कालखंड में यहां के त्रिमोहानी मोहल्ले से प्रकाशित खिचरी समाचार पत्र ने जागरूकता का अद्वितीय आंदोलन चलाया। साप्ताहिक पत्र के प्रत्येक पृष्ठ पर हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में एक ही खबरें प्रकाशित होती थीं ताकि हर भाषा का व्यक्ति अखबार पढ़ सके ।


आत्माहुति के लिए तैयार पत्रकार- नवजागरण आंदोलन के प्रणेता भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र की प्रेमघन जी के साथ मित्रता की वजह से साहित्य और पत्रकारिता का गढ़ मिर्जापुर था । 1881 में प्रेमघन जी ने आनन्द कादम्बिनी का प्रकाशन शुरू किया । इलाहाबाद से प्रतापगढ़ के राजा कालाकांकर के अभ्युदय पत्रिका के सम्पादक पं मदनमोहन मालवीय राजा साहब के प्रेस में शराब पीकर आने से खिन्न हुए तथा इस्तीफा दे बैठे। मालवीय जी की ससुराल नगर के बड़ी माता मुहल्ले में थी । इसलिए वे जब भी यहां आए, हिंदी भाषा और पत्रकारिता के उत्थान के संदर्भ में प्रेमघन की कोठी में जरूर आए।  मतवाला में पांडेय बेचन शर्मा उग्र भी आक्रामक लेख, कहानी लिखते रहे । सबका जमावड़ा गऊघाट स्थित सेठ जी का प्रेस होता था । मतवाला में छप जाना इलाहाबाद से प्रकाशित सरस्वती में छपने जैसा गौरव बोध कराता था लेखकों और पत्रकारों को ।
     इन सारे तथ्यों के साथ शोधपत्र में हिंदी पत्रकारिता के उन्नयन के लिए सुझाव भी दिए गए । पिछले एक दशककी चैनलीय पत्रकारिता के कारण आमजनता में उठते भावों पर भी चर्चा की गई है । अंततोगत्वा सार्थक समाज के लिए सार्थक पत्रकारिता पर बल दिया गया । हिंदी पत्रकारिता की पूर्व संध्या पर शोधपत्र जारी करते हुए इस बार कोरोना के मद्देनजर पत्रकारिता दिवस पर जश्न मनाने से परहेज को उचित कदम कहा गया है ।


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