हाल-ए-अंगूर की बेटी का जल्वा


◆◆◆ शराबनाम ◆◆◆◆


लेखक : गंगा नहाने वाला


मुगल बादशाह की खिदमत में लिखा गया अकबरनामा खूब प्रसिद्ध ही नहीं हुआ बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में मध्ययुग से आधुनिक सबर्ल्टन युग में भी पढ़ा जा रहा है। उत्तर आधुनिक काल और साइबर एज के बाद हिंदी गौरव डॉ भवदेव पांडेय ने 2010 में अंदाजा लगा लिया था। अपने लेखन में पहलीबार आने वाले वक्त को सबर्ल्टन युग का उल्लेख उन्होंने 21वीं सदी के प्रथम चरण किया था। वह युग आ भी गया है। डॉ पांडेय ने लिखा कि वह युग श्रमिकों और मजदूरों का युग माना जाएगा। समय के पहले ही डॉ पांडेय ने इस युग को देख लिया था। हालांकि उनका अनुमान मध्य 21वीं सदी की ओर था क्योंकि साइबर-एज में कल-पुर्जों तथा प्रौद्योगिकी के चलते भौतिकवादियों का वर्चस्व बने रहने का अनुमान था लेकिन वैश्विक आतंक का पॉप-सांग कर रहे कोरोना ने 3 दशक पूर्व ही समय को सबर्ल्टनयुग बना दिया है।


सर्वत्र सबर्ल्टन का ही तो बोलबाला है - कलमुंहे कोरोना के साम्राज्य में जिधर देखिए मजदूर और मजबूर ही दिख रहे हैं। देश ही नहीं बल्कि विश्व के कोनों-कोनों में लॉकडाउन में सिर पर गृहस्थी का बोझा लादे, कांधे पर बीबी-बच्चों को लादे पैदल चलते, लुढ़कते, गिरते और पड़ते तो यही सबर्ल्टन युग के पात्र दिख जा रहे है। देश में, पर-देश में, हाइवे पर, रोड के किनारे यही फंसे हैं वरना हाई-फाई घरों के लोग हों, उन्हें जामाता की तरह चलिए ज़नाब, घर जल्द चलिए, मम्मा रो रही है, डैड (पापा) की हालत खराब है, भैया, बहन, चाचा-चाची कई दिनों से अन्न जल त्याग किए बैठी हैं। हम आपको लेने आए हैं। आप हमारी बस में बैठ जाएंगे तो बस हमें स्वर्ग सा सुख और आनन्द मिलेगा का राग अलापने वालों को सबने देखा-सुना था।


हमारी तुलना इन सबर्ल्टनों से न करो यारो- इस मेहमान-नवाज़ी पर कौन न लुभा जाए ऐ खुदा ! इस पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले कलमची जब लगे कलम चलाने तो एक कोटा-धारक ने बाउंसर बाल फेंक ही दिया कि हमारी तुलना इन सबर्ल्टनों से क्यों की जा रही है ? ये दो कौड़ी के मजबूर मजदूर हैं और हम हैं आने वाले कल के लाल-नीली बत्ती इनोवा में बैठने वाले ? साइकिल की तुलना स्पाइसी-जेट के विमान से क्यों कर रहे हैं ? किसने कलम थमा दिया आपको ? इस बाउंसर गेंद पर कौन नहीं क्लीन-बोल्ड हो जाएगा !


अब देखिए देश की अर्थव्यवस्था चलाने वाले सबर्ल्टन - गणित के सवाल के उत्तर के बाद इति सिद्धम् की तर्ज पर यह तो सिद्ध ही हो गया शराब की दुकानों को लॉकडाउन में ढील के दौरान डिकटिंशन मॉर्क्स के साथ मिले प्रथम स्थान को देखकर । दारू की खुली दुकान में ये  सबर्ल्टन ज्यादा शोभायमान हो रहे हैं । हुजुरे-आला ने भी सर्टिफिकेट देते हुए अनाउंस किया कि ये नहीं रहेंगे तो हम कहाँ रहेंगे ? इनके लड़खड़ाते पांव से ही हुजुरे-आला का पांव स्थिर रहता है। सुनहरे भविष्य बनाने के लिए और जमीन पर ठोस कदम उठाने में वे सक्षम हो पाते हैं ।


एक मद्यपायी की अकाट्य-दलील - अंगूर की बेटी की दुकानें जैसे खुली तो एक मद्यपायी किसी शायर की ग़ज़ल की ऐसी-तैसी कर बैठा।  शायर कहता है- *न पीना हराम है न पिलाना हराम है, सिर्फ पी के मचल जाना हराम है* लेकिन 40 दिनों बाद पीने के स्वर्णयुग में मचलना नहीं हुआ तो फिर पीना ही हराम है । लालगंज में दारू के बगल में इलेक्ट्रॉनिक की दुकान वाले की दुकान पर मचलने लगा तो इस दुकानदार ने जब शब्दों से इलेक्ट्रिक का झटका देना चाहा तो मद्यपायी का आत्मबल और स्वाभिमान जाग उठा । जरा देखिए कैसे ?


अरे खैर मनाओ हमारी वजह से दुकान खोले बैठो हो - मद्यपान के बाद अंदर का ज्ञान प्रसिद्ध फिलासफर अरस्तू, प्लेटो से नीचे कहाँ निकलता है। मद्यपायी तपाक से बोल पड़ा- ए दो कौड़ी के इलेक्ट्रिक वाले, हमारी महत्ता जानना चाहते हो, तो हुजुरे-आला का चैनलों पर इंटरव्यू देखो। बोतल से निकली आज़ादी के चलते ही तुम्हें भी दोयम दर्जे का स्थान मिला है। पहले हमारी बारी आई तब तुम्हारी । इसलिए जरा बैठकर पी लेने दो । खलल डाले तो फिर जानते हो न नौ लाख की हवेली के बारे में । दुकान का डल्ला-पल्ला वहीं पहुंच जाएगा।


लेखक "सलिल पांडेय" मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार है।


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