" दूर जब भटकता है मन चली आती हूँ ऐसे ही भटकते हुए "


✍ नीलम शर्मा "नीलू"


देख रहे हो न मिटने का दौर भी
शुष्क और सूखी जमीन मेरे 
दिल की।


दम तोड़ने लगी है !
उस रिक्तता को भरने कोसों
दूर जब भटकता है मन
चली आती हूँ ऐसे ही
भटकते हुए।


शुष्क जमीन पर दिखाई 
देते हैं कुछ कटीले पौधे
जो पनप रहे हैं
अनचाहे और अंजान।


जो जन्मे हैं बिना इच्छाओं
के सहारे, जिन्हें धूप ताप
बारिश की जरुरत नहीं
और खौफ भी नहीं है।


कविताओं में जो मुखर
दर्द को जन्म दे रहे हैं
एहसास उस दर्द का जब
शायद चढ़ नहीं पाया
रंग उन पर।


रंगरेज मैं तो रंग में
रंगी हूँ, जो आज तक
भटकते हुए खोलकर
दिल के दरवाजे को
भटका लेती हूँ तेरे
पास आज भी अपने
कदम इस अंजान
रास्ते पर ऐसे ही
चलते-चलते।


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