आपकी यादें तो हम पर यूँ गज़ब ढाने लगीं… गज़ल


✍️  रंजना मिश्रा, (कानपुर, उत्तर प्रदेश)


आपकी यादें तो हम पर यूँ गज़ब ढाने लगीं
होश खो बैठे हैं हम मदहोशियांँ छाने लगीं


रात दिन बस आपके ही ख्वाब में बैठे हैं हम
ये हवाएंँ भी संदेशा आपका लाने लगीं


हर नज़र को आपके दीदार का है इंतजार
ये तरन्नुम सी फिजाएंँ भी हैं मुस्काने लगीं


इन मचलती धड़कनों को हम संभालें किस तरह
आपकी दीवानगी का ये कहर ढाने लगीं


हाले ग़म किसको सुनाएँ हम भला बतलाइए
इश्क की ये बंदिशें भी अब हमें भाने लगीं


अश्क आंँखों में उतर कर बह रहे हैं इस तरह
कश्तियाँ साहिल से आकर के ज्यों टकराने लगीं


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